महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1887, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहंसस्तु मृदुनैकेन विक्रान्तुमुपचक्रमे ।। ४२ ।।
प्रत्यहीयत काकाच्च मुहूर्तमिव मारिष ।
आर्य! हंसने एक ही मृदुल गतिसे उड़ना आरम्भ किया था; अतः दो घड़ीतक वह कौएसे हारता-सा प्रतीत हुआ ।। ४२ १/२ ।।
अवमन्य च हंसांस्तानिदं वचनमब्रुवन् ।। ४३ ।।
योऽसावुत्पतितो हंसः सोऽसावेवं प्रहीयते ।
तब कौओंने हंसोंका अपमान करके इस प्रकार कहा—‘वह जो हंस उड़ा था, वह तो इस प्रकार कौएसे पिछड़ता जा रहा है!’ ।। ४३ १/२ ।।
अथ हंसः स तच्छ्रुत्वा प्रापतत् पश्चिमां दिशम् ।। ४४ ।।
उपर्युपरि वेनेन सागरं मकरालयम् ।
उड़नेवाले हंसने कौओंकी वह बात सुनकर बड़े वेगसे मकरालय समुद्रके ऊपर-ऊपर पश्चिम दिशाकी ओर उड़ना आरम्भ किया ।। ४४ १/२ ।।
ततो भीः प्राविशत् काकं तदा तत्र विचेतसम् ।। ४५ ।।
द्वीपद्रुमानपश्यन्तं निपातार्थे श्रमान्वितम् ।
इधर कौआ थक गया था। उसे कहीं आश्रय लेनेके लिये द्वीप या वृक्ष नहीं दिखायी दे रहे थे; अतः उसके मनमें भय समा गया और वह घबराकर अचेत-सा हो उठा ।। ४५ १/२ ।।
निपतेयं क्व नु श्रान्त इति तस्मिञ्जलार्णवे ।। ४६ ।।
अविषह्यः समुद्रो हि बहुसत्त्वगणालयः ।
महासत्त्वशतोद्भासी नभसोऽपि विशिष्यते ।। ४७ ।।
कौआ सोचने लगा, ‘मैं थक जानेपर इस जलराशिमें कहाँ उतरूँगा? बहुत-से जल-जन्तुओंका निवासस्थान समुद्र मेरे लिये असह्य है। असंख्य महाप्राणियोंसे उद्भासित होनेवाला यह महासागर तो आकाशसे भी बढ़कर है’ ।। ४६-४७ ।।
गाम्भीर्याद्धि समुद्रस्य न विशेषं हि सूतज ।
दिगम्बराम्भसः कर्ण समुद्रस्था विदुर्जनाः ।। ४८ ।।
विदूरपातात् तोयस्य किं पुनः कर्ण वायसः ।
सूतपुत्र कर्ण! समुद्रमें विचरनेवाले मनुष्य भी उसकी गम्भीरताके कारण दिशाओंद्वारा आवृत उसकी जलराशिकी थाह नहीं जान पाते, फिर वह कौआ कुछ दूरतक उड़ने मात्रसे उस समुद्रके जलसमूहका पार कैसे पा सकता था? ।। ४८ १/२ ।।
अथ हंसोऽप्यतिक्रम्य मुहूर्तमिति चेति च ।। ४९ ।।
अवेक्षमाणस्तं काकं नाशकद् व्यपसर्पितुम् ।
उधर हंस दो घड़ीतक उड़कर इधर-उधर देखता हुआ कौएकी प्रतीक्षामें आगे न जा सका ।। ४९ १/२ ।।