महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1587, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुरुनन्दन! शिविरोंमें भी वे भूपगण सुख न पा सके। संग्राममें जो घोर विनाश हुआ था, उसका चिन्तन करते हुए दुःख और शोकमें डूब गये ॥ ४ ॥
विशेषतः सूतपुत्रो राजा चैव सुयोधनः ।
दुःशासनश्च शकुनिः सौबलश्च महाबलः ॥ ५ ॥
उषितास्ते निशां तां तु दुर्योधननिवेशने ।
चिन्तयन्तः परिक्लेशान् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ ६ ॥
विशेषतः सूतपुत्र कर्ण, राजा दुर्योधन, दुःशासन तथा महाबली सुबलपुत्र शकुनि—ये चारों उस रातको दुर्योधनके ही शिविरमें रहे और महात्मा पाण्डवोंको जो बड़े-बड़े क्लेश दिये गये थे; उनका चिन्तन करते रहे ॥ ५-६ ॥
यत् तद् द्यूते परिक्लिष्टा कृष्णा चानायिता सभाम् ।
तत् स्मरन्तोऽनुशोचन्तो भृशमुद्विग्नचेतसः ॥ ७ ॥
द्यूत-क्रीडाके समय जो द्रुपदकुमारी कृष्णाको सभामें लाया गया और उसे सर्वथा क्लेश पहुँचाया गया, उसका बारंबार स्मरण करके वे शोकमग्न हो जाते और मन-ही-मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठते थे ॥ ७ ॥
तथा तु संचिन्तयतां तान् क्लेशान् द्यूतकारितान् ।
दुःखेन क्षणदा राजन् जगामाब्दशतोपमा ॥ ८ ॥
राजन्! इस प्रकार पाण्डवोंको जूएके द्वारा प्राप्त कराये गये उन क्लेशोंका चिन्तन करते-करते उनकी वह रात सौ वर्षोंके समान बड़े कष्टसे व्यतीत हुई ॥ ८ ॥
ततः प्रभाते विमले स्थिता दिष्टस्य शासने ।
चक्रुरावश्यकं सर्वे विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ९ ॥
तदनन्तर निर्मल प्रभातकाल आनेपर दैवके अधीन हुए समस्त कौरवोंने शास्त्रोक्त विधिके अनुसार शौच, स्नान, संध्या-वन्दन आदि आवश्यक कार्य पूर्ण किया ॥ ९ ॥
ते कृत्वावश्यककार्याणि समाश्वस्य च भारत ।
योगमाज्ञापयामासुर्युद्धाय च विनिर्ययुः ॥ १० ॥
कर्णं सेनापतिं कृत्वा कृतकौतुकमङ्गलाः ।
पूजयित्वा द्विजश्रेष्ठान् दधिपात्रघृताक्षतैः ॥ ११ ॥
गोभिरश्वैश्च निष्कैश्च वासोभिश्च महाधनैः ।
वन्द्यमाना जयाशीर्भिः सूतमागधवन्दिभिः ॥ १२ ॥
भरतनन्दन! प्रतिदिनके आवश्यक कार्य सम्पन्न करके आश्वस्त हो उन्होंने सैनिकोंको कवच आदि धारण करके तैयार हो जानेकी आज्ञा दी तथा कौतुक एवं मांगलिक कृत्य पूर्ण करके कर्णको सेनापति बनाकर वे सब-के-सब दही, पात्र, घृत, अक्षत, गौ, अश्व, कण्ठभूषण तथा बहुमूल्य वस्त्रोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करके सूत, मागध और