महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 1071 of 3237
Read in contextअष्टचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनका कर्णको फटकारना और वृषसेनके वधकी प्रतिज्ञा करना, श्रीकृष्णका अर्जुनको बधाई देकर उन्हें रणभूमिका भयानक दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना
धृतराष्ट्र उवाच
तथा गतेषु शूरेषु तेषां मम च संजय ।
किं वै भीमस्तदाकार्षीत् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! जब पाण्डवपक्षके और मेरे शूरवीर सैनिक पूर्वोक्तरूपसे युद्धके लिये उद्यत हो गये, तब भीमसेनने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १ ॥
संजय उवाच
विरथो भीमसेनो वै कर्णवाक्शल्यपीडितः ।
अमर्षवशमापन्नः फाल्गुनं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! रथहीन भीमसेन कर्णके वाग्बाणोंसे पीड़ित हो अमर्षके वशीभूत हो गये थे। वे अर्जुनसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
पुनः पुनस्तूबरक मूढ औदरिकेति च ।
अकृतास्त्रक मा योत्सीर्बाल संग्रामकातर ॥ ३ ॥
इति मामब्रवीत् कर्णः पश्यतस्ते धनंजय ।
एवं वक्ता च मे वध्यस्तेन चोक्तोऽस्मि भारत ॥ ४ ॥
‘धनंजय! कर्णने तुम्हारे सामने ही मुझसे बारंबार कहा है कि ‘अरे! तू निमूंछिया, मूर्ख, पेटू, अस्त्रविद्याको न जाननेवाला, बालक और संग्रामभीरु है; अतः युद्ध न कर।' भारत! जो ऐसा कह दे, वह मेरा वध्य होता है। उसने मुझे ऐसा कह दिया ॥ ३-४ ॥
एतद् व्रतं महाबाहो त्वया सह कृतं मया ।
तथैतन्मम कौन्तेय यथा तव न संशयः ॥ ५ ॥
‘महाबाहु कुन्तीकुमार! ऐसा कहनेवालेके वधकी यह प्रतिज्ञा मैंने तुम्हारे साथ ही की थी। यह कर्णका वध जैसे मेरा कार्य है, वैसे ही तुम्हारा भी है, इसमें संशय नहीं है ॥
तद्वधाय नरश्रेष्ठ स्मरैतद् वचनं मम ।
यथा भवति तत् सत्यं तथा कुरु धनंजय ॥ ६ ॥
‘नरश्रेष्ठ! कर्णके वधके लिये तुम मेरे इस कथनपर भी ध्यान दो। धनंजय! जैसे भी मेरी वह प्रतिज्ञा सत्य हो सके, वैसा प्रयत्न करो' ॥ ६ ॥
तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य भीमस्यामितविक्रमः ।