महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextपञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
धर्मज्ञो बलवान् शूरः सत्यो राक्षसपुङ्गवः ।
भक्तोऽस्मानौरसः पुत्रो भीम गृह्णातु मा चिरम् ॥ १ ॥
तव भीम सुतेनाहमतिभीमपराक्रम ।
अक्षतः सह पाञ्चाल्या गच्छेयं गन्धमादनम् ॥ २ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**अत्यन्त भयानक पराक्रम दिखानेवाले भीम! तुम्हारा औरस पुत्र राक्षसश्रेष्ठ घटोत्कच धर्मज्ञ, बलवान्, शूरवीर, सत्यवादी तथा हमलोगोंका भक्त है। यह हमें शीघ्र उठा ले चले। जिससे भीमसेन! तुम्हारे पुत्र घटोत्कचद्वारा शरीरसे किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही मैं द्रौपदीसहित गन्धमादन पर्वतपर पहुँच जाऊँ ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय भीमसेनो घटोत्कचम् ।
आदिदेश नरव्याघ्रस्तनयं शत्रुकर्शनम् ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! भाईकी इस आज्ञाको शिरोधार्य करके नरश्रेष्ठ भीमसेनने अपने पुत्र शत्रुसूदन घटोत्कचको इस प्रकार आज्ञा दी ॥ ३ ॥
भीमसेन उवाच
हैडिम्बेय परिश्रान्ता तव मातापराजित ।
त्वं च कामगमस्तात बलवान् वह तां खग ॥ ४ ॥
**भीमसेन बोले—**अपराजित और आकाशचारी हिडिम्बानन्दन! तुम्हारी माता द्रौपदी बहुत थक गयी है। तुम बलवान् एवं इच्छानुसार सर्वत्र जानेमें समर्थ हो; अतः इसे (आकाशमार्गसे) ले चलो ॥ ४ ॥
स्कन्धमारोप्य भद्रं ते मध्येऽस्माकं विहायसा ।
गच्छ नीचिकया गत्या यथा चैनां न पीडयेः ॥ ५ ॥
बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। इसे कंधेपर बैठाकर हम लोगोंके बीच रहते हुए आकाशमार्गसे इस प्रकार धीरे-धीरे ले चलो, जिससे इसे तनिक भी कष्ट न हो ॥ ५ ॥
घटोत्कच उवाच