महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंद्वारा गङ्गाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना
लोमश उवाच
द्रष्टारः पर्वताः सर्वे नद्यः सपुरकाननाः ।
तीर्थानि चैव श्रीमन्ति स्पृष्टं च सलिलं करैः ॥ १ ॥
लोमशजीने कहा—तीर्थदर्शी पाण्डुकुमारो! तुमने सब पर्वतोंके दर्शन कर लिये। नगरों और वनोंसहित नदियोंका भी अवलोकन किया। शोभाशाली तीर्थोंके भी दर्शन किये और उन सबके जलका अपने हाथोंसे स्पर्श भी कर लिया ॥ १ ॥
पर्वतं मन्दरं दिव्यमेष पन्थाः प्रयास्यति ।
समाहिता निरुद्विग्नाः सर्वे भवत पाण्डवाः ॥ २ ॥
अयं देवनिवासो वै गन्तव्यो वो भविष्यति ।
ऋषीणां चैव दिव्यानां निवासः पुण्यकर्मणाम् ॥ ३ ॥
पाण्डवो! यह मार्ग दिव्य मन्दराचलकी ओर जायगा। अब तुम सब लोग उद्वेगशून्य और एकाग्रचित्त हो जाओ। यह देवताओंका निवासस्थान है, जिसपर तुम्हें चलना होगा। यहाँ पुण्यकर्म करनेवाले दिव्य ऋषियोंका भी निवास है ॥ २-३ ॥
एषा शिवजला पुण्या याति सौम्य महानदी ।
बदरीप्रभवा राजन् देवर्षिगणसेविता ॥ ४ ॥
सौम्य स्वभाववाले नरेश! यह कल्याणमय जलसे भरी हुई पुण्यस्वरूपा महानदी अलकनन्दा (गंगा) प्रवाहित होती है, जो देवर्षियोंके समुदायसे सेवित है। इसका प्रादुर्भाव बदरिकाश्रमसे ही हुआ है ॥ ४ ॥
एषा वैहायसैर्नित्यं बालखिल्यैर्महात्मभिः ।
अर्चिता चोपयाता च गन्धर्वैश्च महात्मभिः ॥ ५ ॥
आकाशचारी महात्मा बालखिल्य तथा महामना गन्धर्वगण भी नित्य इसके तटपर आते-जाते हैं और इसकी पूजा करते हैं ॥ ५ ॥
अत्र साम स्म गायन्ति सामगाः पुण्यनिःस्वनाः ।
मरीचिः पुलहश्चैव भृगुश्चैवाङ्गिरास्तथा ॥ ६ ॥
सामगान करनेवाले विद्वान् वेदमन्त्रोंकी पुण्यमयी ध्वनि फैलाते हुए यहाँ सामवेदकी ऋचाओंका गान करते हैं। मरीचि, पुलह, भृगु तथा अंगिरा भी यहाँ जप एवं स्वाध्याय करते