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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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एकचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना

युधिष्ठिर उवाच

भीमसेन यमौ चोभौ पाञ्चालि च निबोधत ।
नास्ति भूतस्य नाशो वै पश्यतास्मान् वनेचरान् ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले— भीमसेन, नकुल-सहदेव और द्रौपदी! तुम सब लोग ध्यान देकर सुनो। यह निश्चय है कि पूर्वकृत कर्मोंका बिना भोगे कभी नाश नहीं होता। देखो, उन्हींके कारण आज हम राजकुमार होकर भी वन-वनमें भटक रहे हैं ॥ १ ॥

दुर्बलाः क्लेशिताः स्मेति यद् ब्रुवामेतरेतरम् ।
अशक्येऽपि व्रजामो यद् धनंजयदिदृक्षया ॥ २ ॥
यद्यपि हमलोग दुर्बल हैं, क्लेशमें पड़े हुए हैं, तथापि जो एक-दूसरेसे उत्साहपूर्वक बातें करते हैं और जहाँ जाना सम्भव नहीं उस मार्गपर भी आगे बढ़ते जा रहे हैं, उसमें एक ही कारण है, हम सबके हृदयमें अर्जुनको देखनेके लिये प्रबल उत्कण्ठा है ॥ २ ॥

तन्मे दहति गात्राणि तूलराशिमिवानलः ।
यच्च वीरं न पश्यामि धनंजयमुपान्तिकात् ॥ ३ ॥
इतना प्रयास करनेपर भी मैं वीर धनंजयको जो अबतक अपने समीप नहीं देख पा रहा हूँ, इसकी चिन्ता मेरे सम्पूर्ण अंगोंको उसी प्रकार दग्ध कर रही है, जैसे आग रूईके ढेरको जलाती रहती है ॥ ३ ॥

तस्य दर्शनतृष्णं मां सानुजं वनमास्थितम् ।
याज्ञसेन्याः परामर्शः स च वीर दहत्युत ॥ ४ ॥
उसीके दर्शनकी प्यास लेकर मैं भाइयोंसहित इस वनमें आया हूँ। वीर भीमसेन! दुःशासनने जो द्रौपदीके केश पकड़ लिये थे, वह घटना याद आकर मुझे और भी शोकसे दग्ध कर देती है ॥ ४ ॥

नकुलात् पूर्वजं पार्थं न पश्याम्यमितौजसम् ।
अजेयमुग्रधन्वानं तेन तप्ये वृकोदर ॥ ५ ॥
वृकोदर! भयंकर धनुष धारण करनेवाले अजेय वीर अमिततेजस्वी अर्जुनको जो नकुलसे पहले उत्पन्न हुआ है, मैं अबतक नहीं देख रहा हूँ, इसके कारण मुझे बड़ा संताप हो रहा है ॥ ५ ॥