महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
DevanagariSanskritpublished2,580 pages
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जिस समय उसकी चर्बीकी आहुति दी जायगी उस समय उसके धूएँको सूँघ लेनेपर सब माताएँ (गर्भवती हो) आपके लिये अत्यन्त पराक्रमी पुत्रोंको जन्म देंगी ॥ २० ॥
तस्यामेव तु ते जन्तुर्भविता पुनरात्मजः ।
उत्तरे चास्य सौवर्णं लक्ष्म पार्श्वे भविष्यति ॥ २१ ॥
आपका पुत्र जन्तु पुनः अपनी माताके ही पेटसे उत्पन्न होगा। उस समय उसकी बायीं पसलीमें एक सुनहरा चिह्न होगा ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि लोमशतीर्थयात्रायां जन्तूपाख्याने सप्तविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें लोमशतीर्थयात्राके प्रसंगमें जन्तूपाख्यानविषयक एक सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२७ ॥