महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 874, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रवार्य जन्तुं सहसा स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ॥ ७ ॥
इससे उसकी सब माताएँ भी सहसा जन्तुके शरीरसे चींटीको हटाकर अत्यन्त दुखी हो जोर-जोरसे रोने लगीं। उनके रोदनकी वह सम्मिलित ध्वनि बड़ी भयंकर प्रतीत हुई ॥ ७ ॥
तमार्तनादं सहसा शुश्राव स महीपतिः ।
अमात्यपर्षदो मध्ये उपविष्टः सहर्त्विजा ॥ ८ ॥
उस समय राजा सोमक पुरोहितके साथ मन्त्रियोंकी सभामें बैठे थे। उन्होंने अकस्मात् वह आर्तनाद सुना ॥
ततः प्रस्थापयामास किमेतदिति पार्थिवः ।
तस्मै क्षत्ता यथावृत्तमाचचक्षे सुतं प्रति ॥ ९ ॥
सुनकर राजाने 'यह क्या हो गया?' इस बातका पता लगानेके लिये द्वारपालको भेजा। द्वारपालने लौटकर राजकुमारसे सम्बन्ध रखनेवाली पूर्वोक्त घटनाका यथावत् वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ९ ॥
त्वरमाणः स चोत्थाय सोमकः सह मन्त्रिभिः ।
प्रविश्यान्तःपुरं पुत्रमाश्वासयदरिंदमः ॥ १० ॥
तब शत्रुदमन राजा सोमकने मन्त्रियोंसहित उठकर बड़ी उतावलीके साथ अन्तःपुरमें प्रवेश किया और पुत्रको आश्वासन दिया ॥ १० ॥
सान्त्वयित्वा तु तं पुत्रं निष्क्रम्यान्तःपुरान्नृपः ।
ऋत्विजा सहितो राजन् सहामात्य उपाविशत् ॥ ११ ॥
बेटेको सान्त्वना देकर राजा अन्तःपुरसे बाहर निकले और पुरोहित तथा मन्त्रियोंके साथ पुनः मन्त्रणा-गृहमें जा बैठे ॥ ११ ॥
सोमक उवाच
धिगस्त्विहैकपुत्रत्वमपुत्रत्वं वरं भवेत् ।
नित्यातुरत्वाद् भूतानां शोक एवैकपुत्रता ॥ १२ ॥
उस समय सोमकने कहा— इस संसारमें किसी पुरुषके एक ही पुत्रका होना धिक्कारका विषय है। एक पुत्र होनेकी अपेक्षा तो पुत्रहीन रह जाना ही अच्छा है। एक ही संतान हो तो सब प्राणी उसके लिये सदा आकुल-व्याकुल रहते हैं, अतः एक पुत्रका होना शोक ही है ॥
इदं भार्याशतं ब्रह्मन् परीक्ष्य सदृशं प्रभो ।
पुत्रार्थिना मया वोढं न तासां विद्यते प्रजा ॥ १३ ॥
ब्रह्मन्! मैंने अच्छी तरह जाँच-बूझकर पुत्रकी इच्छासे अपने योग्य सौ स्त्रियोंके साथ विवाह किया, किंतु उनके कोई संतान नहीं हुई ॥ १३ ॥
एकः कथंचिदुत्पन्नः पुत्रो जन्तुरयं मम ।