Skip to content
SarvaKosh
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

Page 846 of 2580

Read in context
Page 846

⬅ विषय-सूची (TOC)

द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

महर्षि च्यवनको सुकन्याकी प्राप्ति

लोमश उवाच

भृगोर्महर्षेः पुत्रोऽभूच्च्यवनो नाम भारत ।
समीपे सरसस्तस्य तपस्तेपे महाद्युतिः ॥ १ ॥
स्थाणुभूतो महातेजा वीरस्थानेन पाण्डव ।
अतिष्ठत चिरं कालमेकदेशे विशाम्पते ॥ २ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! महर्षि भृगुके पुत्र च्यवन मुनि हुए, जो महान् तेजस्वी थे। उन्होंने उस सरोवरके समीप तपस्या आरम्भ की। पाण्डुनन्दन! परम तेजस्वी महात्मा च्यवन वीरासनसे बैठकर ठूंठे काठके समान जान पड़ते थे। राजन्! वे एक ही स्थानपर दीर्घकालतक अविचलभावसे बैठे रहे ॥ १-२ ॥

स वल्मीकोऽभवदृषिर्लताभिरिव संवृतः ।
कालेन महता राजन् समाकीर्णः पिपीलिकैः ॥ ३ ॥
धीरे-धीरे अधिक समय बीतनेपर उनका शरीर चींटियोंसे व्याप्त हो गया। वे महर्षि लताओंसे आच्छादित हो गये और बाँबीके समान प्रतीत होने लगे ॥ ३ ॥

तथा स संवृतो धीमान् मृत्पिण्ड इव सर्वशः ।
तप्यते स्म तपो घोरं वल्मीकेन समावृतः ॥ ४ ॥
इस प्रकार लता-वेलोंसे आच्छादित हो बुद्धिमान् च्यवन मुनि सब ओरसे केवल मिट्टीके लोंदेके समान जान पड़ने लगे। दीमकोंद्वारा जमा की हुई मिट्टीके ढेरसे ढके हुए वे बड़ी भारी तपस्या कर रहे थे ॥ ४ ॥

अथ दीर्घस्य कालस्य शर्यातिर्नाम पार्थिवः ।
आजगाम सरो रम्यं विहर्तुमिदमुत्तमम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार दीर्घकाल व्यतीत होनेपर राजा शर्याति इस उत्तम एवं रमणीय सरोवरके तटपर विहारके लिये आये ॥ ५ ॥

तस्य स्त्रीणां सहस्राणि चत्वार्यासन् परिग्रहे ।
एकैव च सुता सुभ्रूः सुकन्या नाम भारत ॥ ६ ॥
युधिष्ठिर! उनके अन्तःपुरमें चार हजार स्त्रियाँ थीं, परंतु संतानके नामपर केवल एक ही सुन्दरी पुत्री थी, जिसका नाम सुकन्या था ॥ ६ ॥

सा सखीभिः परिवृता दिव्याभरणभूषिता ।
चंक्रम्यमाणा वल्मीकं भार्गवस्य समासदत् ॥ ७ ॥