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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः

भगीरथका हिमालयपर तपस्याद्वारा गंगा और महादेवजीको प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करना

लोमश उवाच

स तु राजा महेष्वासश्चक्रवर्ती महारथः ।
बभूव सर्वलोकस्य मनोनयननन्दनः ॥ १ ॥
**लोमशजी कहते हैं—**राजन्! महान् धनुर्धर महारथी राजा भगीरथ चक्रवर्ती नरेश थे। वे सब लोगोंके मन और नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाले थे ॥ १ ॥

स शुश्राव महाबाहुः कपिलेन महात्मना ।
पितॄणां निधनं घोरमप्राप्तिं त्रिदिवस्य च ॥ २ ॥
स राज्यं सचिवे न्यस्य हृदयेन विदूयता ।
जगाम हिमवत्पार्श्वं तपस्तप्तुं नरेश्वर ॥ ३ ॥
नरेश्वर! उन महाबाहुने जब यह सुना कि महात्मा कपिलद्वारा हमारे (साठ हजार) पितरोंकी भयंकर मृत्यु हुई है और वे स्वर्गप्राप्तिसे वंचित रह गये हैं तब उन्होंने व्यथित हृदयसे अपना राज्य मन्त्रीको सौंप दिया और स्वयं हिमालयके शिखरपर तपस्या करनेके लिये प्रस्थान किया ॥ २-३ ॥

आरिराधयिषुर्गङ्गां तपसा दग्धकिल्बिषः ।
सोऽपश्यत नरश्रेष्ठ हिमवन्तं नगोत्तमम् ॥ ४ ॥
शृङ्गैर्बहुविधाकारैर्धातुमद्भिरलंकृतम् ।
पवनालम्बिभिर्मेघैः परिषिक्तं समन्ततः ॥ ५ ॥
नरेश्वर! तपस्यासे सारा पाप नष्ट करके वे गंगाजीकी आराधना करना चाहते थे। उन्होंने देखा कि गिरिराज हिमालय विविध धातुओंसे विभूषित नाना प्रकारके शिखरोंसे अलंकृत है। वायुके आधारपर उड़नेवाले मेघ चारों ओरसे उसका अभिषेक कर रहे हैं ॥ ४-५ ॥

नदीकुञ्जनितम्बैश्च प्रासादैरुपशोभितम् ।
गुहाकन्दरसंलीनसिंहव्याघ्रनिषेवितम् ॥ ६ ॥
अनेकानेक नदियों, निकुञ्जों, घाटियों और प्रासादों (मन्दिरों)-से इसकी बड़ी शोभा हो रही है। गुफाओं और कन्दराओंमें छिपे हुए सिंह तथा व्याघ्रोंसे यह पर्वत सदा सेवित होता है ॥ ६ ॥

शकुनैश्च विचित्राङ्गैः कूजद्भिर्विविधा गिरः ।