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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 363, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 363

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एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

संजयके द्वारा धृतराष्ट्रकी बातोंका अनुमोदन और धृतराष्ट्रका संताप

संजय उवाच

यदेतत् कथितं राजंस्त्वया दुर्योधनं प्रति ।
सर्वमेतद् यथातत्त्वं नैतन्मिथ्या महीपते ॥ १ ॥
संजय बोला— राजन्! आपने दुर्योधनके विषयमें जो बातें कही हैं, वे सभी यथार्थ हैं। महीपते! आपका वचन मिथ्या नहीं है ॥ १ ॥

मन्युना हि समाविष्टाः पाण्डवास्ते महौजसः ।
दृष्ट्वा कृष्णां सभां नीतां धर्मपत्नीं यशस्विनीम् ॥ २ ॥
दुःशासनस्य ता वाचः श्रुत्वा ते दारुणोदयाः ।
कर्णस्य च महाराज जुगुप्सन्तीति मे मतिः ॥ ३ ॥
महातेजस्वी वे पाण्डव अपनी धर्मपत्नी यशस्विनी कृष्णाको सभामें लायी गयी देखकर क्रोधसे भरे हुए हैं और महाराज! दुःशासन तथा कर्णकी वे कठोर बातें सुनकर पाण्डव आपलोगोंकी निन्दा करते हैं, ऐसा मुझे विश्वास है ॥ २-३ ॥

श्रुतं हि मे महाराज यथा पार्थेन संयुगे ।
एकादशतनुः स्थाणुर्धनुषा परितोषितः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! मैंने यह भी सुना है कि कुन्तीकुमार अर्जुनने एकादश मूर्तिधारी भगवान् शंकरको भी अपने धनुष-बाणकी कलाद्वारा संतुष्ट किया है ॥ ४ ॥

कैरातं वेषमास्थाय योधयामास फाल्गुनम् ।
जिज्ञासुः सर्वदेवेशः कपर्दी भगवान् स्वयम् ॥ ५ ॥
जटाजूटधारी सर्वदेवेश्वर भगवान् शंकरने स्वयं ही अर्जुनके बलकी परीक्षा लेनेके लिये किरातवेष धारण करके उनके साथ युद्ध किया था ॥ ५ ॥

तत्रैनं लोकपालास्ते दर्शयामासुरर्जुनम् ।
अस्त्रहेतोः पराक्रान्तं तपसा कौरवर्षभम् ॥ ६ ॥
वहाँ अस्त्रप्राप्तिके लिये विशेष उद्योगशील कुरु-कुलरत्न अर्जुनको उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर उन लोकपालोंने भी दर्शन दिया था ॥ ६ ॥

नैतदुत्सहते चान्यो लब्धुमन्यत्र फाल्गुनात् ।
साक्षाद् दर्शनमेतेषामीश्वराणां नरो भुवि ॥ ७ ॥

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