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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान् शंकर और अर्जुनका युद्ध, अर्जुनपर उनका प्रसन्न होना एवं अर्जुनके द्वारा भगवान् शंकरकी स्तुति

वैशम्पायन उवाच

गतेषु तेषु सर्वेषु तपस्विषु महात्मसु ।
पिनाकपाणिर्भगवान् सर्वपापहरो हरः ॥ १ ॥
कैरातं वेषमास्थाय काञ्चनद्रुमसंनिभम् ।
विभ्राजमानो विपुलो गिरिर्मेरुरिवापरः ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उन सब तपस्वी महात्माओंके चले जानेपर सर्वपापहारी, पिनाक-पाणि, भगवान् शंकर किरातवेष धारण करके सुवर्णमय वृक्षके सदृश दिव्य कान्तिसे उद्भासित होने लगे। उनका शरीर दूसरे मेरुपर्वतके समान दीप्तिमान् और विशाल था ॥ १-२ ॥

श्रीमद् धनुरुपादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।
निष्पपात महावेगो दहनो देहवानिव ॥ ३ ॥

वे एक शोभायमान धनुष और सर्पोंके समान विषाक्त बाण लेकर बड़े वेगसे चले। मानो साक्षात् अग्निदेव ही देह धारण करके निकले हों ॥ ३ ॥

देव्या सहोमया श्रीमान् समानव्रतवेषया ।
नानावेषधरैर्हृष्टैर्भूतैरनुगतस्तदा ॥ ४ ॥
किरातवेषसंछन्नः स्त्रीभिश्चापि सहस्रशः ।
अशोभत तदा राजन् स देशोऽतीव भारत ॥ ५ ॥

उनके साथ भगवती उमा भी थीं, जिनका व्रत और वेष भी उन्हींके समान था। अनेक प्रकारके वेष धारण किये भूतगण भी प्रसन्नतापूर्वक उनके पीछे हो लिये थे। इस प्रकार किरातवेषमें छिपे हुए श्रीमान् शिव सहस्रों स्त्रियोंसे घिरकर बड़ी शोभा पा रहे थे। भरतवंशी राजन्! उस समय वह प्रदेश उन सबके चलने-फिरनेसे अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ ४-५ ॥

क्षणेन तद् वनं सर्वं निःशब्दमभवत् तदा ।
नादः प्रस्रवणानां च पक्षिणां चाप्युपारमत् ॥ ६ ॥

एक ही क्षणमें वह सारा वन शब्दरहित हो गया। झरनों और पक्षियोंतककी आवाज बंद हो गयी ॥ ६ ॥

स संनिकर्षमागम्य पार्थस्याक्लिष्टकर्मणः ।