महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयेषां मन्युर्मनुष्याणां क्षमयाभिहतः सदा ।
तेषां परतरे लोकास्तस्मात् क्षान्तिः परा मता ॥ ४४ ॥
जिन मनुष्योंका क्रोध सदा क्षमाभावसे दबा रहता है, उन्हें सर्वोत्तम लोक प्राप्त होते हैं। अतः क्षमा सबसे उत्कृष्ट मानी गयी है ॥ ४४ ॥
इति गीताः काश्यपेन गाथा नित्यं क्षमावताम् ।
श्रुत्वा गाथाः क्षमायास्त्वं तुष्य द्रौपदि मा क्रुधः ॥ ४५ ॥
इस प्रकार काश्यपजीने नित्य क्षमाशील पुरुषोंकी इस गाथाका गान किया है। द्रौपदी! क्षमाकी यह गाथा सुनकर संतुष्ट हो जाओ, क्रोध न करो ॥ ४५ ॥
पितामहः शान्तनवः शमं सम्पूजयिष्यति ।
कृष्णश्च देवकीपुत्रः शमं सम्पूजयिष्यति ॥ ४६ ॥
मेरे पितामह शान्तनुनन्दन भीष्म शान्तिभावका ही आदर करेंगे। देवकीनन्दन श्रीकृष्ण भी शान्तिभावका ही आदर करेंगे ॥ ४६ ॥
आचार्यों विदुरः क्षत्ता शममेव वदिष्यतः ।
कृपश्च संजयश्चैव शममेव वदिष्यतः ॥ ४७ ॥
आचार्य द्रोण और विदुर भी शान्तिको ही अच्छा कहेंगे। कृपाचार्य और संजय भी शान्त रहना ही अच्छा बतायेंगे ॥ ४७ ॥
सोमदत्तो युयुत्सुश्च द्रोणपुत्रस्तथैव च ।
पितामहश्च नो व्यासः शमं वदति नित्यशः ॥ ४८ ॥
सोमदत्त, युयुत्सु, अश्वत्थामा तथा हमारे पितामह व्यास भी सदा शान्तिका ही उपदेश देते हैं ॥ ४८ ॥
एतैर्हि राजा नियतं चोद्यमानः शमं प्रति ।
राज्यं दातेति मे बुद्धिर्न चेल्लोभान्निशिष्यति ॥ ४९ ॥
ये सब लोग यदि राजा धृतराष्ट्रको सदा शान्तिके लिये प्रेरित करते रहेंगे तो वे अवश्य मुझे राज्य दे देंगे, ऐसा मुझे विश्वास है। यदि नहीं देंगे तो लोभके कारण नष्ट हो जायँगे ॥ ४९ ॥
कालोऽयं दारुणः प्राप्तो भरतानामभूतये ।
निश्चितं मे सदैवैतत् पुरस्तादपि भाविनि ॥ ५० ॥
सुयोधनो नार्हतीति क्षमामेवं न विन्दति ।
अर्हस्तत्राहमित्येवं तस्मान्मां विन्दते क्षमा ॥ ५१ ॥
इस समय भरतवंशके विनाशके लिये यह बड़ा भयंकर समय आ गया है। भामिनि! मेरा पहलेसे ही ऐसा निश्चित मत है कि सुयोधन कभी भी इस प्रकार क्षमा-भावको नहीं अपना सकता, वह इसके योग्य नहीं है। मैं इसके योग्य हूँ, इसलिये क्षमा मेरा ही आश्रय लेती है ॥