महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
DevanagariSanskritpublished2,580 pages
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गोत्रं च नामापि च शंस तत्त्वतः
किं चापि शिल्पं तव विद्यते कृतम् ॥ ११ ॥
‘अपने गोत्र और नाम भी ठीक-ठीक बताइये। साथ ही यह भी कहें कि आपने किस विद्या या कलामें कुशलता प्राप्त की है ॥ ११ ॥
युधिष्ठिर उवाच
युधिष्ठिरस्यासमहं पुरा सखा
वैयाघ्रपद्यः पुनरस्मि विप्रः ।
अक्षान् प्रयोक्तुं कुशलोऽस्मि देविनां
कङ्केति नाम्नास्मि विराट विश्रुतः ॥ १२ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महाराज विराट! मैं वैयाघ्रपद-गोत्रमें उत्पन्न हुआ ब्राह्मण हूँ। लोगोंमें ‘कंक’ नामसे मेरी प्रसिद्धि है। मैं पहले राजा युधिष्ठिरके साथ रहता था। वे मुझे अपना सखा मानते थे। मैं चौसर खेलनेवालोंके बीच पासे फेंकनेकी कलामें कुशल हूँ ॥ १२ ॥
विराट उवाच