महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextयच्च तद्रुक्मपात्रीभिर्ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ।
ह्रियते ते गृहादन्नं संस्कृतं सार्वकामिकम् ॥ १५ ॥
एक दिन वह था कि आपके घरसे सहस्रों ब्राह्मणोंके लिये सोनेकी थालियोंमें सब प्रकारकी रुचिके अनुकूल तैयार किया हुआ सुन्दर भोजन परोसा जाता था ॥ १५ ॥
यतीनामगृहाणां ते तथैव गृहमेधिनाम् ।
दीयते भोजनं राजन्नतीवगुणवत् प्रभो ॥ १६ ॥
शक्तिशाली महाराज! उन दिनों प्रतिदिन यतियों, ब्रह्मचारियों और गृहस्थ ब्राह्मणोंको भी अत्यन्त गुणकारी भोजन अर्पित किया जाता था ॥ १६ ॥
सत्कृतानि सहस्राणि सर्वकामैः पुरा गृहे ।
सर्वकामैः सुविहितैर्यदपूजयथा द्विजान् ॥ १७ ॥
पहले आपके राजभवनमें सहस्रों (सुवर्णमय) पात्र थे, जो सम्पूर्ण इच्छानुकूल भोज्य पदार्थोंसे भरे-पूरे रहते थे और उनके द्वारा आप समस्त अभीष्ट मनोरथोंकी पूर्ति करते हुए प्रतिदिन ब्राह्मणोंका सत्कार करते थे ॥ १७ ॥
तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ।
यत् ते भ्रातॄन् महाराज युवानो मृष्टकुण्डलाः ॥ १८ ॥
अभोजयन्त मिष्टान्नंः सूदाः परमसंस्कृतैः ।
सर्वांस्तानद्य पश्यामि वने वन्येन जीविनः ॥ १९ ॥
राजन्! आज वह सब न देखनेके कारण मेरे हृदयको क्या शान्ति मिलेगी? महाराज! आपके जिन भाइयोंको कानोंमें सुन्दर कुण्डल पहने हुए तरुण रसोइये अच्छे प्रकारसे बनाये हुए स्वादिष्ट अन्न परोसकर भोजन कराया करते थे, उन सबको आज वनमें जंगली फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते देख रही हूँ ॥ १८-१९ ॥
अदुःखार्हान् मनुष्येन्द्र नोपशाम्यति मे मनः ।
भीमसेनमिमं चापि दुःखितं वनवासिनम् ॥ २० ॥
ध्यायतः किं न मन्युस्ते प्राप्ते काले विवर्धते ।
भीमसेनं हि कर्माणि स्वयं कुर्वाणमच्युतम् ॥ २१ ॥
सुखार्हं दुःखितं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ।
नरेन्द्र! आपके भाई दुःख भोगनेके योग्य नहीं हैं; आज इन्हें दुःखमें देखकर मेरा चित्त किसी प्रकार शान्त नहीं हो पाता है। महाराज! वनमें रहकर दुःख भोगते हुए इन अपने भाई भीमसेनका स्मरण करके समय आनेपर क्या शत्रुओंके प्रति आपका क्रोध नहीं बढ़ेगा? मैं पूछती हूँ—युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले और सुख भोगनेके योग्य भीमसेनको स्वयं अपने हाथोंसे सब काम करते और दुःख उठाते देखकर शत्रुओंपर आपका क्रोध क्यों नहीं भड़क उठा? ॥ २०-२१ ½ ॥
सत्कृतं विविधैर्यानैर्वस्त्रैरुच्चावचैस्तथा ॥ २२ ॥