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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1814, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1814

प्रोवाच पुरुषव्याघ्रं भीममाहवशोभिनम् ॥ १२ ॥
उस समय सिन्धुराज जयद्रथ धरतीपर घसीटा जा रहा था। उसने उपर्युक्त शर्त स्वीकार कर ली और युद्धमें शोभा पानेवाले पुरुषसिंह भीमसेनसे अपनी स्वीकृति स्पष्ट बता दी ॥ १२ ॥

तत एनं विचेष्टन्तं बद्ध्वा पार्थो वृकोदरः ।
रथमारोपयामास विसंज्ञं पांसुगुण्ठितम् ॥ १३ ॥
तदनन्तर वह उठनेकी चेष्टा करने लगा। तब कुन्तीकुमार वृकोदरने उसे बाँधकर रथपर डाल दिया। वह बेचारा धूलसे लथपथ और अचेत हो रहा था ॥

ततस्तं रथमास्थाय भीमः पार्थानुगस्तदा ।
अभ्येत्याश्रममध्यस्थमभ्यगच्छद् युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
उसे रथपर चढ़ाकर आगे-आगे भीम चले और पीछे-पीछे अर्जुन। आश्रमपर आकर भीमसेन वहाँ मध्यभागमें बैठे हुए राजा युधिष्ठिरके पास गये ॥ १४ ॥

दर्शयामास भीमस्तु तदवस्थं जयद्रथम् ।
तं राजा प्राहसद् दृष्ट्वा मुच्यतामिति चाब्रवीत् ॥ १५ ॥
भीमने उसी अवस्थामें जयद्रथको महाराजके सामने उपस्थित किया। उसे देखकर राजा युधिष्ठिर जोर-जोरसे हँसने लगे और बोले—'अब इसे छोड़ दो' ॥ १५ ॥

राजानं चाब्रवीद् भीमो द्रौपद्याः कथ्यतामिति ।
दासभावगतो ह्येष पाण्डूनां पापचेतनः ॥ १६ ॥
तब भीमसेनने भी राजासे कहा—'आप द्रौपदीको यह सूचित कर दीजिये कि यह पापात्मा जयद्रथ पाण्डवोंका दास हो चुका है' ॥ १६ ॥

तमुवाच ततो ज्येष्ठो भ्राता सप्रणयं वचः ।
मुञ्चैनमधमाचारं प्रमाणा यदि ते वयम् ॥ १७ ॥
तब बड़े भाई युधिष्ठिरने प्रेमपूर्वक भीमसेनसे कहा—'यदि तुम मेरी बात मानते हो तो इस पापाचारीको छोड़ दो' ॥ १७ ॥