महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1627, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्वयाऽऽक्षिप्ता महाबाहो दीप्यमानेव दृश्यते ।
‘राजेन्द्र! तुम्हारे शत्रु शीघ्र ही शोकसे दीन-दुर्बल हो गये हैं। महाबाहो! तुमने राजा युधिष्ठिरसे इस लक्ष्मीको अपने बुद्धिबलसे छीन लिया है। अतः अब तुम्हारे यहाँ यह प्रकाशित होती-सी दिखायी दे रही है।। ६ ½ ।।
तथैव तव राजेन्द्र राजानः परवीरहन् ।। ७ ।।
शासनेऽधिष्ठिताः सर्वे किं कुर्म इति वादिनः ।
‘शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाराज! इसी प्रकार सब राजा अपनेको किंकर बताते हुए आपकी आज्ञाके अधीन रहते हैं।। ७ ½ ।।
तवेयं पृथिवी राजन् निखिला सागराम्बरा ।। ८ ।।
सपर्वतवना देवी सग्रामनगराकरा ।
नानावनाद्देशवती पर्वतैरुपशोभिता ।। ९ ।।
‘राजन्! इस समय यह सारी समुद्रवसना पृथ्वीदेवी पर्वत, वन, ग्राम, नगर तथा खानोंके साथ तुम्हारे अधिकारमें आ गयी है। यह नाना प्रकारके प्रदेशोंसे युक्त तथा पर्वतोंसे सुशोभित है।। ८-९ ।।
(नानाध्वजपताकाङ्का स्फीतराष्ट्रा महाबला)
‘नाना प्रकारकी ध्वजा-पताकाओंसे चिह्नित इस भूतलपर कितने ही समृद्धिशाली राष्ट्र हैं और वहाँ बहुत-सी विशाल सेनाएँ संगठित हैं।।
वन्द्यमानो द्विजै राजन् पूज्यमानश्च राजभिः ।
पौरुषाद् दिवि देवेषु भ्राजसे रश्मिवानिव ।। १० ।।
‘राजन्! तुम अपने पुरुषार्थसे द्विजोंद्वारा सम्मानित तथा राजाओंद्वारा पूजित होकर स्वर्ग एवं देवताओंमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति इस भूतलपर प्रकाशित हो रहे हो।। १० ।।
रुद्रैरिव यमो राजा मरुद्भिरिव वासवः ।
कुरुभिस्त्वं वृतो राजन् भासि नक्षत्रराडिव ।। ११ ।।
‘महाराज! जिस प्रकार रुद्रोंसे यमराज, मरुद्गणोंसे इन्द्र तथा नक्षत्रोंसे उनके स्वामी चन्द्रमाकी शोभा होती है, उसी प्रकार कौरवोंसे घिरे हुए तुम शोभा पा रहे हो।।
यैः स्म ते नाद्रियेताज्ञा न च ये शासने स्थिताः ।
पश्यामस्तान् श्रिया हीनान् पाण्डवान् वनवासिनः ।। १२ ।।
‘जिन्होंने तुम्हारी आज्ञाका आदर नहीं किया था और जो तुम्हारे शासनमें नहीं थे, उन पाण्डवोंकी दशा हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं। वे राजलक्ष्मीसे वञ्चित हो वनमें निवास करते हैं।। १२ ।।
श्रूयते हि महाराज सरो द्वैतवनं प्रति ।
वसन्तः पाण्डवाः सार्धं ब्राह्मणैर्वनवासिभिः ।। १३ ।।