महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान
मार्कण्डेय उवाच
ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा ।
हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥ १ ॥
एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः ।
परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुखसे आग उगलनेवाले दर्पयुक्त पार्षदगण—ये तथा दूसरे बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी प्राणी मातृकागणोंके साथ रहकर महासेनको सब ओरसे घेरे हुए उनकी रक्षाके लिये खड़े थे ॥ १-२ ॥
संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः ।
आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥ ३ ॥
देवेश्वर इन्द्रको अपनी विजयके विषयमें संदेह ही दिखायी देता था, तो भी वे विजयकी अभिलाषासे ऐरावत हाथीपर आरूढ़ हो देवताओंके साथ आगे बढ़े ॥ ३ ॥
आदाय वज्रं बलवान् सर्वैर्देवगणैर्वृतः ।
विजिघांसुर्महासेनम्रिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥ ४ ॥
सब देवताओंसे घिरे हुए बलवान् इन्द्र महासेनको मार डालनेकी इच्छासे हाथमें वज्र ले बड़े वेगसे अग्रसर हो रहे थे ॥ ४ ॥
उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम् ।
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥ ५ ॥
प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलङ्कृतम् ।
विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥ ६ ॥
देवताओंकी सेना बड़ी भयानक थी। उसमें जोर-जोरसे विकट गर्जना हो रही थी। उसकी प्रभाका विस्तार महान् था। उसके ध्वज संनाह (कवच) विचित्र थे। सभी सैनिकोंके वाहन और धनुष नाना प्रकारके दिखायी देते थे। सबने श्रेष्ठ वस्त्रोंसे अपने शरीरको आच्छादित कर रखा था। सभी लोग श्रीसम्पन्न तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देते थे। इन्द्रको अपने वधके लिये आते देख कुमारने भी उनपर धावा बोल दिया ॥ ५-६ ॥
विनदन् पार्थ देवेशो द्रुतं याति महाबलः ।