महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextत्रयोदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म-साक्षात्कारके उपाय
ब्राह्मण उवाच
पार्थिवं धातुमासाद्य शारीरोऽग्निः कथं भवेत् ।
अवकाशविशेषेण कथं वर्तयतेऽनिलः ॥ १ ॥
ब्राह्मणने पूछा— व्याध! शरीरमें रहनेवाला अग्निस্বরূপ प्राण पार्थिव धातुका अवलम्बन करके कैसे रहता है? और प्राणवायु नाड़ियोंके मार्गविशेषके द्वारा किस प्रकार (रस-रक्तादिका) संचालन करता है? ।। १ ।।
मार्कण्डेय उवाच
प्रश्नमेतं समुद्दिष्टं ब्राह्मणेन युधिष्ठिर ।
व्याधस्तु कथयामास ब्राह्मणाय महात्मने ॥ २ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ब्राह्मणके द्वारा उपस्थित किये गये इस प्रश्नको सुनकर धर्मव्याधने उन महामना ब्राह्मणसे इस प्रकार कहा— ।। २ ।।
व्याध उवाच
मूर्धानमाश्रितो वह्निः शरीरं परिपालयन् ।
प्राणो मूर्धनि चाग्नौ च वर्तमानो विचेष्टते ॥ ३ ॥
धर्मव्याध बोला— ब्रह्मन्! प्राणीके शरीरको सुरक्षित रखता हुआ अग्निस্বরূপ उदान वायु मस्तकका आश्रय लेकर शरीरमें रहता है एवं मुख्य प्राण मस्तक और उदानवायु—इन दोनोंमें स्थित हुआ समस्त शरीरमें जीवनका संचार करता है१। ।। ३ ।।
भूतं भव्यं भविष्यं च सर्वं प्राणे प्रतिष्ठितम् ।
श्रेष्ठं तदेव भूतानां ब्रह्मयोनिमुपास्महे ॥ ४ ॥
भूत, वर्तमान और भविष्य—सब कुछ प्राणके ही आश्रित है, वह प्राण ही समस्त भूतोंमें श्रेष्ठ है।२ अतः परब्रह्मसे उत्पन्न होनेवाले प्राणकी हम सब उपासना करते हैं३। ।। ४ ।।
स जन्तुः सर्वभूतात्मा पुरुषः स सनातनः ।
महान् बुद्धिरहङ्कारो भूतानां विषयश्च सः ॥ ५ ॥
वह प्राण ही जीव है, वही समस्त प्राणियोंका आत्मा है, वही सनातन पुरुष है, महत्तत्त्व, बुद्धि और अहंकार तथा पाँचों भूतोंके कार्यरूप इन्द्रियाँ और उनके विषय सब