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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,580 pages

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एकोननवत्यधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना

देव उवाच

कामं देवा अपि न मां विप्र जानन्ति तत्त्वतः ।
त्वत्प्रीत्या तु प्रवक्ष्यामि यथेदं विसृजाम्यहम् ॥ १ ॥
**भगवान् बोले—**विप्रवर! देवता भी मेरे स्वरूपको यथेष्ट और यथार्थरूपसे नहीं जानते। मैं जिस प्रकार इस जगत्‌की रचना करता हूँ, वह तुम्हारे प्रेमके कारण तुम्हें बताऊँगा ॥ १ ॥
पितृभक्तोऽसि विप्रर्षे मां चैव शरणं गतः ।
ततो दृष्टोऽस्मि ते साक्षाद् ब्रह्मचर्यं च ते महत् ॥ २ ॥
ब्रह्मर्षे! तुम पितृभक्त हो, मेरी शरणमें आये हो और तुमने महान् ब्रह्मचर्यका पालन किया है। इन्हीं सब कारणोंसे तुम्हें मेरे साक्षात् स्वरूपका दर्शन हुआ ॥ २ ॥
अपां नारा इति पुरा संज्ञाकर्म कृतं मया ।
तेन नारायणोऽप्युक्तो मम तत् त्वयनं सदा ॥ ३ ॥
पूर्वकालमें मैंने ही जलका 'नारा' नाम रखा था। वह 'नारा' मेरा सदा अयन (वासस्थान) है, इसलिये मैं 'नारायण' नामसे विख्यात हूँ ॥ ३ ॥
अहं नारायणो नाम प्रभवः शाश्वतोऽव्ययः ।
विधाता सर्वभूतानां संहर्ता च द्विजोत्तम ॥ ४ ॥
अहं विष्णुरहं ब्रह्मा शक्रश्चाहं सुराधिपः ।
अहं वैश्रवणो राजा यमः प्रेताधिपस्तथा ॥ ५ ॥
मैं नारायण ही सबकी उत्पत्तिका कारण, सनातन और अविनाशी हूँ। द्विजश्रेष्ठ! सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टि और संहार करनेवाला भी मैं ही हूँ। मैं ही विष्णु हूँ, मैं ही ब्रह्मा हूँ, मैं ही देवराज इन्द्र हूँ और मैं ही राजा कुबेर तथा प्रेतराज यम हूँ ॥ ४-५ ॥
अहं शिवश्च सोमश्च कश्यपोऽथ प्रजापतिः ।
अहं धाता विधाता च यज्ञश्चाहं द्विजोत्तम ॥ ६ ॥
विप्रवर! मैं ही शिव, चन्द्रमा, प्रजापति कश्यप, धाता, विधाता और यज्ञ हूँ ॥ ६ ॥
अग्निरास्यं क्षितिः पादौ चन्द्रादित्यौ च लोचने ।
द्यौर्मूर्धा खं दिशः श्रोत्रे तथाऽपः स्वेदसम्भवाः ॥ ७ ॥