महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextअष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना
जनमेजय उवाच
कथं नागायुतप्राणो भीमो भीमपराक्रमः।
भयमाहारयत् तीव्रं तस्मादजगरान्मुने ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**मुने! भयानक पराक्रमी भीमसेनमें तो दस हजार हाथियोंका बल था। फिर उन्हें उस अजगरसे इतना तीव्र भय कैसे प्राप्त हुआ? ॥ १ ॥
पौलस्त्यं धनदं युद्धे य आह्वयति दर्पितः।
नलिन्यां कदनं कृत्वा निहन्ता यक्षरक्षसाम् ॥ २ ॥
तं शंससि भयाविष्टमापन्नमरिसूदनम्।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ॥ ३ ॥
जो बलके घमंडमें आकर पुलस्त्यनन्दन कुबेरको भी युद्धके लिये ललकारते थे, जिन्होंने कुबेरकी पुष्करिणीके तटपर कितने ही यक्षों तथा राक्षसोंका संहार कर डाला था, उन्हीं शत्रुसूदन भीमसेनको आप भयभीत (और विपत्तिग्रस्त) बताते हैं। अतः मैं इस प्रसंगको विस्तारसे सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ा कौतूहल हो रहा है ॥ २-३ ॥
वैशम्पायन उवाच
बह्वाश्चर्ये वने तेषां वसतामुग्रधन्विनाम्।
प्राप्तानामाश्रमाद् राजन् राजर्षेर्वृषपर्वणः ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! राजर्षि वृषपर्वाके आश्रमसे आकर उग्र धनुर्धर पाण्डव अनेक आश्चर्योंसे भरे हुए उस द्वैतवनमें निवास करते थे ॥ ४ ॥
यदृच्छया धनुष्पाणिर्बद्धखड्गो वृकोदरः।
ददर्श तद् वनं रम्यं देवगन्धर्वसेवितम् ॥ ५ ॥
भीमसेन तलवार बाँधकर हाथमें धनुष लिये अकस्मात् घूमने निकल जाते और देवताओं तथा गन्धर्वोंसे सेवित उस रमणीय वनकी शोभा निहारते थे ॥ ५ ॥
स ददर्श शुभान् देशान् गिरेर्हिमवतस्तदा।
देवर्षिसिद्धचरितानप्सरोगणसेवितान् ॥ ६ ॥
उन्होंने हिमालय पर्वतके उन शुभ प्रदेशोंका अवलोकन किया जहाँ देवर्षि और सिद्ध पुरुष विचरण करते थे तथा अप्सराएँ जिनका सदा सेवन करती थीं ॥ ६ ॥