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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1195, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1195

वनानि रम्याणि नदीः सरांसि
गुहा गिरीणां गिरिगह्वराणि
एते निवासाः सततं बभूवु-
र्दिवानिशं प्राप्य नरर्षभाणाम् ॥ ५ ॥
पुरुषरत्न पाण्डव कभी रमणीय वनोंमें, कभी सरोवरोंके किनारे, कभी नदियोंके तटपर और कभी पर्वतोंकी छोटी-बड़ी गुफाओंमें दिन या रातके समय ठहरते जाते थे। सदा ऐसे ही स्थानोंमें उनका निवास होता था ।। ५ ।।

ते दुर्गवासं बहुधा निरुष्य
व्यतीत्य कैलासमचिन्त्यरूपम्
आसेदुरत्यर्थमनोरमं ते
तमाश्रमाग्र्यं वृषपर्वणस्तु ॥ ६ ॥
अनेक बार दुर्गम स्थानोंमें निवास करके अचिन्त्यरूप कैलासपर्वतको पीछे छोड़कर वे पुनः वृषपर्वाके अत्यन्त मनोरम उस श्रेष्ठ आश्रममें आ पहुँचे ।। ६ ।।

समेत्य राज्ञा वृषपर्वणा ते
प्रत्यर्चितास्तेन च वीतमोहाः
शशंसिरे विस्तरशः प्रवासं
गिरौ यथावद् वृषपर्वणस्ते ॥ ७ ॥
वहाँ राजा वृषपर्वासे मिलकर और उनसे भलीभाँति पूजित होकर उन सबका शोक-मोह दूर हो गया। फिर उन्होंने वृषपर्वासे गन्धमादन पर्वतपर अपने रहनेके वृत्तान्तका यथार्थरूपसे एवं विस्तारपूर्वक वर्णन किया ।।

सुखोषितास्तस्य त एकरात्रं
पुण्याश्रमे देवमहर्षिजुष्टे
अभ्याययुस्ते बदरीं विशालां
सुखेन वीराः पुनरेव वासम् ॥ ८ ॥
उस पवित्र आश्रममें देवता और महर्षि निवास किया करते थे। वहाँ एक रात सुखपूर्वक रहकर वे वीर पाण्डव फिर विशालापुरीके बदरिकाश्रमतीर्थमें चले आये और वहाँ बड़े आनन्दसे रहे ।। ८ ।।

ऊषुस्ततस्तत्र महानुभावा
नारायणस्थानगताः समग्राः
कुबेरकान्तां नलिनीं विशोकाः
सम्पश्यमानाः सुरसिद्धजुष्टाम् ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् वहाँ भगवान् नर-नारायणके क्षेत्रमें आकर सभी महानुभाव पाण्डवोंने सुखपूर्वक निवास किया और शोकरहित हो कुबेरकी उस प्रिय पुष्करिणीका दर्शन किया,