महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1167, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंते वज्रवेगविहता दानवाः पर्वतोपमाः ।
इतरेतरमाश्लिष्य न्यपतन् पृथिवीतले ॥ १६ ॥
फिर तो वज्रके वेगसे मारे गये वे पर्वताकार दानव एक-दूसरेका आलिंगन करते हुए धराशायी हो गये ॥ १६ ॥
अन्तर्भूमौ च येऽगृह्णन् दानवा रथवाजिनः ।
अनुप्रविश्य तान् बाणाः प्राहिण्वन् यमसादनम् ॥ १७ ॥
पृथ्वीके भीतर घुसकर जिन दानवोंने मेरे रथके घोड़ोंको पकड़ रखा था, उनके शरीरमें भी घुसकर मेरे बाणोंने उन सबको यमलोक भेज दिया ॥ १७ ॥
हतैर्निवातकवचैर्निरस्तैः पर्वतोपमैः ।
समाच्छाद्यत देशः स विकीर्णैरिव पर्वतः ॥ १८ ॥
वहाँ मरकर गिरे हुए पर्वताकार निवातकवच इधर-उधर बिखरे हुए पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। वहाँका सारा प्रदेश उनकी लाशोंसे पट गया था ॥ १८ ॥
न हयानां क्षतिः काचिन्न रथस्य न मातलेः ।
मम चादृश्यत तदा तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १९ ॥
उस समयके युद्धमें न तो घोड़ोंको कोई हानि पहुँची, न रथका ही कोई सामान टूटा, न मातलिको ही चोट लगी और न मेरे ही शरीरमें कोई आघात दिखायी दिया, यह एक अद्भुत-सी बात थी ॥ १९ ॥
ततो मां प्रहसन् राजन् मातलिः प्रत्यभाषत ।
नैतदर्जुन देवेषु त्वयि वीर्यं यदीक्ष्यते ॥ २० ॥
तब मातलिने हँसते हुए मुझसे कहा—‘अर्जुन! तुममें जो पराक्रम दिखायी देता है, वह देवताओंमें भी नहीं है’ ॥ २० ॥
हतेष्वसुरसंघेषु दारास्तेषां तु सर्वशः ।
प्राक्रोशन् नगरे तस्मिन् यथा शरदि सारसाः ॥ २१ ॥
उन असुरसमूहोंके मारे जानेपर उनकी सारी स्त्रियाँ उस नगरमें जोर-जोरसे करुण क्रन्दन करने लगीं, मानो शरत्कालमें सारस पक्षी बोल रहे हों ॥ २१ ॥
ततो मातलिना सार्धमहं तत् पुरमभ्ययाम् ।
त्रासयन् रथघोषेण निवातकवचस्त्रियः ॥ २२ ॥
तब मैं मातलिके साथ रथकी घर्घरहाटसे निवातकवचोंकी स्त्रियोंको भयभीत करता हुआ उस दैत्य-नगरमें गया ॥ २२ ॥
तान् दृष्ट्वा दशसाहस्रान् मयूरसदृशान् हयान् ।
रथं च रविसंकाशं प्राद्रवन् गणशः स्त्रियः ॥ २३ ॥
मोरके समान सुन्दर उन दस हजार घोड़ोंको तथा सूर्यके समान तेजस्वी उस दिव्य रथको देखते ही झुंड-की-झुंड दानवस्त्रियाँ इधर-उधर भाग चलीं ॥ २३ ॥