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सर्वकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 1152, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 1152

रथं तं तु समाश्लिष्य³ प्राद्रवद् रथयोगवित् ।
त्रासयन् रथघोषेण तत् पुरं समुपाद्रवत् ॥ ८ ॥
औरोंकी तो बात ही क्या है, वहाँ भयानक वायु भी पथ-भ्रान्तकी भाँति भटकने लगती
है। वायुका वह चक्कर काटना अद्भुत-सा प्रतीत हो रहा था। इस प्रकार अत्यन्त वेगशाली
जलराशि महासागरको देखकर उसके पास ही मैंने दानवोंसे भरा हुआ वह दैत्यनगर भी
देखा। रथ-संचालनमें कुशल सारथि मातलि तुरंत वहाँ पहुँचकर पातालमें उतरे तथा रथपर
सावधानीसे बैठकर आगे बढ़े। उन्होंने रथकी घर्घराहटसे सबको भयभीत करते हुए उस
दैत्यपुरकी ओर धावा किया ॥ ६-८ ॥

रथघोषं तु तं श्रुत्वा स्तनयित्नोरिवाम्बरे ।
मन्वाना देवराजं मामाविग्ना दानवाभवन् ॥ ९ ॥
आकाशमें होनेवाली मेघ-गर्जनाके समान उस रथका शब्द सुनकर दानवलोग मुझे
देवराज इन्द्र समझकर भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठे ॥ ९ ॥

सर्वे सम्भ्रान्तमनसः शरचापधराः स्थिताः ।
तथासिशूलपरशुगदामुसलपाणयः ॥ १० ॥
सभी मन-ही-मन घबरा गये। सभी अपने हाथोंमें धनुष-बाण, तलवार, शूल, फरसा,
गदा और मुसल आदि अस्त्र-शस्त्र लेकर खड़े हो गये ॥ १० ॥

ततो द्वाराणि पिदधुर्दानवास्त्रस्तचेतसः ।
संविधाय पुरे रक्षां न स्म कश्चन दृश्यते ॥ ११ ॥
दानवोंके मनमें आतंक छा गया था। इसलिये उन्होंने नगरकी रक्षाका प्रबन्ध करके
सारे दरवाजे बंद कर लिये। नगरके बाहर कोई भी दिखायी नहीं देता था ॥ ११ ॥

ततः शङ्खमुपादाय देवदत्तं महास्वनम् ।
परमां मुदमाश्रित्य प्राधमं तं शनैरहम् ॥ १२ ॥
तब मैंने बड़ी भयंकर ध्वनि करनेवाले देवदत्त नामक शंखको हाथमें लेकर अत्यन्त
प्रसन्न हो धीरे-धीरे उसे बजाया ॥ १२ ॥

स तु शब्दो दिवं स्तब्ध्वा प्रतिशब्दमजीजनत् ।
वित्रैसुश्च निलिल्युश्च भूतानि सुमहान्त्यपि ॥ १३ ॥
वह शंखनाद स्वर्गलोकसे टकराकर प्रतिध्वनि उत्पन्न करने लगा। उसकी आवाज
सुनकर बड़े-बड़े प्राणी भी भयभीत हो इधर-उधर छिप गये ॥ १३ ॥

ततो निवातकवचाः सर्व एव स्वलंकृताः ।
दंशिता विविधैस्त्राणैर्विचित्रायुधपाणयः ॥ १४ ॥
आयसैश्च महाशूलैर्गदाभिर्मुसलैरपि ।
पट्टिशैः करवालैश्च रथचक्रैश्च भारत ॥ १५ ॥
शतघ्नीभिर्भुशुण्डीभिः खड्गैश्चित्रैः स्वलंकृतैः ।