महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 1130 of 2580
Read in contextसप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या-यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र-प्राप्तिकी कथा
वैशम्पायन उवाच
यथागतं गते शक्रे भ्रातृभिः सह सङ्गतः ।
कृष्णया चैव बीभत्सुर्धर्मपुत्रमपूजयत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवराज इन्द्रके चले जानेपर भाइयों तथा द्रौपदीके साथ मिलकर अर्जुनने धर्मपुत्र युधिष्ठिरको प्रणाम किया ॥ १ ॥
अभिवादयमानं तं मूर्ध्न्युपाघ्राय पाण्डवम् ।
हर्षगद्गदया वाचा प्रहृष्टोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ २ ॥
पाण्डुनन्दन अर्जुनको प्रणाम करते देख युधिष्ठिर बड़े प्रसन्न हुए एवं उनका मस्तक सूँघकर हर्षगद्गद-वाणीमें इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥
कथमर्जुन कालोऽयं स्वर्गे व्यतिगतस्तव ।
कथं चास्त्राण्यवाप्तानि देवराजश्च तोषितः ॥ ३ ॥
'अर्जुन! स्वर्गमें तुम्हारा यह समय किस प्रकार बीता? कैसे तुमने दिव्यास्त्र प्राप्त किये और कैसे देवराज इन्द्रको संतुष्ट किया? ॥ ३ ॥
सम्यग् वा ते गृहीतानि कच्चिदस्त्राणि पाण्डव ।
कच्चित् सुराधिपः प्रीतो रुद्रो वास्त्राण्यदात् तव ॥ ४ ॥
'पाण्डुनन्दन! क्या तुमने सभी अस्त्र अच्छी तरह सीख लिये? क्या देवराज इन्द्र अथवा भगवान् रुद्रने प्रसन्न होकर तुम्हें अस्त्र प्रदान किये हैं? ॥ ४ ॥
यथा दृष्टश्च ते शक्रो भगवान् वा पिनाकधृक् ।
यथैवास्त्राण्यवाप्तानि यथैवाराधितश्च ते ॥ ५ ॥
यथोक्तवांस्त्वां भगवान् शतक्रतुररिंदम ।
कृतप्रियस्त्वयास्मीति तस्य ते किं प्रियं कृतम् ॥ ६ ॥
'शत्रुदमन! तुमने जिस प्रकार देवराज इन्द्रका दर्शन किया है अथवा जैसे पिनाकधारी भगवान् शिवको देखा है, जिस प्रकार तुमने सब अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त की है और जैसे तुम्हारेद्वारा देवाराधनका कार्य सम्पादित हुआ है, वह सब बताओ। भगवान् इन्द्रने अभी-अभी कहा था कि 'अर्जुनने मेरा अत्यन्त प्रिय कार्य सम्पन्न किया है' सो वह उनका कौन-सा प्रिय कार्य था, जिसे तुमने सम्पन्न किया है ॥ ५-६ ॥