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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 2256 में से

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पृष्ठ 84

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(पर्वसंग्रहपर्व)

द्वितीयोऽध्यायः

समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण,
महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका
संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल

ऋषय ऊचुः

समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन ।
एतत् सर्वं यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ १ ॥
**ऋषि बोले—**सूतनन्दन! आपने अपने प्रवचनके प्रारम्भमें जो समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र)-की चर्चा की थी, अब हम उस देश (तथा वहाँ हुए युद्ध)-के सम्बन्धमें पूर्णरूपसे सब कुछ यथावत् सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥

सौतिरुवाच

शृणुध्वं मम भो विप्रा ब्रुवतश्च कथाः शुभाः ।
समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ॥ २ ॥
**उग्रश्रवाजीने कहा—**साधुशिरोमणि विप्रगण! अब मैं कल्याणदायिनी शुभ कथाएँ कह रहा हूँ; उसे आपलोग सावधान चित्तसे सुनिये और इसी प्रसंगमें समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन भी सुन लीजिये ॥ २ ॥
त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः ।
असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥ ३ ॥
त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने क्षत्रियोंके प्रति क्रोधसे प्रेरित होकर अनेकों बार क्षत्रिय राजाओंका संहार किया ॥ ३ ॥
स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः ।
समन्तपञ्चके पञ्च चकार रौधिरान् हृदान् ॥ ४ ॥
अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीने अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण क्षत्रियवंशका संहार करके समन्तपंचकक्षेत्रमें रक्तके पाँच सरोवर बना दिये ॥ ४ ॥
स तेषु रुधिराम्भःसु हृदेषु क्रोधमूर्च्छितः ।
पितॄन् संतर्पयामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥