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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,256 pages

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

राजाका आस्तीकको वर देनेके लिये तैयार होना, तक्षक नागकी व्याकुलता तथा आस्तीकका वर माँगना

जनमेजय उवाच

बालोऽप्ययं स्थविर इवावभाषते
नायं बालः स्थविरोऽयं मतो मे ।
इच्छाम्यहं वरमस्मै प्रदातुं
तन्मे विप्राः संविदध्वं यथावत् ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा— ब्राह्मणो! यह बालक है तो भी वृद्ध पुरुषोंके समान बात करता है, इसलिये मैं इसे बालक नहीं, वृद्ध मानता हूँ और इसको वर देना चाहता हूँ। इस विषयमें आपलोग अच्छी तरह विचार करके अपनी सम्मति दें ॥ १ ॥

सदस्या ऊचुः

बालोऽपि विप्रो मान्य एवेह राज्ञां
विद्वान् यो वै स पुनर्वे यथावत् ।
सर्वान् कामांस्त्वत्त एवार्हतेऽद्य
यथा च नस्तक्षक एति शीघ्रम् ॥ २ ॥

सदस्योंने कहा— ब्राह्मण यदि बालक हो तो भी यहाँ राजाओंके लिये सम्माननीय ही है। यदि वह विद्वान् हो तब तो कहना ही क्या है? अतः यह ब्राह्मण बालक आज आपसे यथोचित रीतिसे अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको पानेके योग्य है, किंतु वर देनेसे पहले तक्षक नाग चाहे जैसे भी शीघ्रतापूर्वक हमारे पास आ पहुँचे, वैसा उपाय करना चाहिये ॥ २ ॥

सौतिरुवाच

व्याहर्तुकामे वरदे नृपे द्विजं
वरं वृणीष्वेति ततोऽभ्युवाच ।
होता वाक्यं नातिहृष्टान्तरात्मा
कर्मण्यस्मिंस्तक्षको नैति तावत् ॥ ३ ॥

उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! तदनन्तर वर देनेके लिये उद्यत राजा जनमेजय विप्रवर आस्तीकसे यह कहना ही चाहते थे कि 'तुम मुँहमाँगा वर माँग लो।' इतनेमें ही होता, जिसका मन अधिक प्रसन्न नहीं था, बोल उठा—'हमारे इस यज्ञकर्ममें तक्षक नाग तो अभीतक आया ही नहीं' ॥ ३ ॥