महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
जरत्कारु मुनिका नागकन्याके साथ विवाह, नागकन्या जरत्कारुद्वारा पतिसेवा तथा पतिका उसे त्यागकर तपस्याके लिये गमन
सौतिरुवाच
वासुकिस्त्वब्रवीद् वाक्यं जरत्कारुमृषिं तदा ।
सनाम्नी तव कन्येयं स्वसा मे तपसान्विता ॥ १ ॥
भरिष्यामि च ते भार्यां प्रतीच्छेमां द्विजोत्तम ।
रक्षणं च करिष्येऽस्याः सर्वशक्त्या तपोधन ।
त्वदर्थं रक्ष्यते चैषा मया मुनिवरोत्तम ॥ २ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— शौनक! उस समय वासुकिने जरत्कारु मुनिसे कहा—‘द्विजश्रेष्ठ! इस कन्याका वही नाम है, जो आपका है। यह मेरी बहिन है और आपकी ही भाँति तपस्विनी भी है। आप इसे ग्रहण करें। आपकी पत्नीका भरण-पोषण मैं करूँगा। तपोधन! अपनी सारी शक्ति लगाकर मैं इसकी रक्षा करता रहूँगा। मुनिश्रेष्ठ! अबतक आपहीके लिये मैंने इसकी रक्षा की है ॥ १-२ ॥
ऋषिरुवाच
न भरिष्येऽहमेतां वै एष मे समयः कृतः ।
अप्रियं च न कर्तव्यं कृते चैनां त्यजाम्यहम् ॥ ३ ॥
ऋषिने कहा— नागराज! मैं इसका भरण-पोषण नहीं करूँगा, मेरी यह शर्त तो तय हो गयी। अब दूसरी शर्त यह है कि तुम्हारी इस बहिनको कभी ऐसा कार्य नहीं करना चाहिये, जो मुझे अप्रिय लगे। यदि अप्रिय कार्य कर बैठेगी तो उसी समय मैं इसे त्याग दूँगा ॥ ३ ॥
सौतिरुवाच
प्रतिश्रुते तु नागेन भरिष्ये भगिनीमिति ।
जरत्कारुस्तदा वेश्म भुजगस्य जगाम ह ॥ ४ ॥
उग्रश्रवाजी कहते हैं— नागराजने यह शर्त स्वीकार कर ली कि ‘मैं अपनी बहिनका भरण-पोषण करूँगा।' तब जरत्कारु मुनि वासुकिके भवनमें गये ॥ ४ ॥
तत्र मन्त्रविदां श्रेष्ठस्तपोवृद्धो महाव्रतः ।
जग्राह पाणिं धर्मात्मा विधिमन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ५ ॥