महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
विदुर और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा युधिष्ठिरका हस्तिनापुरमें जाकर सबसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
ततः प्रायाद् विदुरोऽश्वैरुदारै-<br>
र्महाजवैर्बलिभिः साधुदान्तैः।<br>
बलान्नियुक्तो धृतराष्ट्रेण राज्ञा<br>
मनीषिणां पाण्डवानां सकाशे ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर राजा धृतराष्ट्रके बलपूर्वक भेजनेपर विदुरजी अत्यन्त वेगशाली, बलवान् और अच्छी प्रकार काबूमें किये हुए महान् अश्वोंसे जुते रथपर सवार हो परम बुद्धिमान् पाण्डवोंके समीप गये ॥ १ ॥
सोऽभिपत्य तदध्वानमासाद्य नृपतेः पुरम्।<br>
प्रविवेश महाबुद्धिः पूज्यमानो द्विजातिभिः ॥ २ ॥
महाबुद्धिमान् विदुरजी उस मार्गको तय करके राजा युधिष्ठिरकी राजधानीमें जा पहुँचे और वहाँ द्विजातियोंसे सम्मानित होकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ २ ॥
स राजगृहमासाद्य कुबेरभवनोपमम्।<br>
अभ्यागच्छत धर्मात्मा धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ३ ॥<br>
तं वै राजा सत्यधृतिर्महात्मा<br>
अजातशत्रुर्विदुरं यथावत्।<br>
पूजापूर्वं प्रतिगृह्याजमीढ-<br>
स्ततोऽपृच्छद् धृतराष्ट्रं सपुत्रम् ॥ ४ ॥
कुबेरके भवनके समान सुशोभित राजमहलमें जाकर धर्मात्मा विदुर धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे मिले। सत्यवादी महात्मा अजमीढनन्दन अजातशत्रु राजा युधिष्ठिरने विदुरजीका यथावत् आदर-सत्कार करके उनसे पुत्रसहित धृतराष्ट्रकी कुशल पूछी ॥ ३-४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
विज्ञायते ते मनसोऽप्रहर्षः<br>
कच्चित् क्षत्तः कुशलेनागतोऽसि।<br>
कच्चित् पुत्राः स्थविरस्यानुलोमा<br>
वशानुगाश्चापि विशोऽथ कच्चित् ॥ ५ ॥