महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context(स्वयंवरपर्व)
त्र्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
पाण्डवोंकी पंचालयात्रा और मार्गमें ब्राह्मणोंसे बातचीत
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते नरशार्दूला भ्रातरः पञ्च पाण्डवाः ।
प्रययुर्द्रौपदीं द्रष्टुं तं च देशं महोत्सवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब वे नरश्रेष्ठ पाँचों भाई पाण्डव राजकुमारी द्रौपदी, उसके पंचालदेश और वहाँके महान् उत्सवको देखनेके लिये वहाँसे चल दिये ॥ १ ॥
ते प्रयाता नरव्याघ्राः सह मात्रा परंतपाः ।
ब्राह्मणान् ददृशुर्मार्गे गच्छतः संगतान् बहून् ॥ २ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान वीर परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ यात्रा कर रहे थे। उन्होंने मार्गमें देखा, बहुत-से ब्राह्मण एक साथ जा रहे हैं ॥ २ ॥
त ऊचुर्ब्राह्मणा राजन् पाण्डवान् ब्रह्मचारिणः ।
क्व भवन्तो गमिष्यन्ति कुतो वाभ्यागता इह ॥ ३ ॥
राजन्! उन ब्रह्मचारी ब्राह्मणोंने पाण्डवोंसे पूछा—'आपलोग कहाँ जायँगे और कहाँसे आ रहे हैं?' ॥ ३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आगतानेकचक्रायाः सोदर्यानेकचारिणः ।
भवन्तो वै विजानन्तु सह मात्रा द्विजर्षभाः ॥ ४ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**विप्रवरो! आपलोगोंको मालूम हो कि हमलोग एक साथ विचरनेवाले सहोदर भाई हैं और अपनी माताके साथ एकचक्रा नगरीसे आ रहे हैं ॥ ४ ॥
ब्राह्मणा ऊचुः
गच्छताद्यैव पञ्चालान् द्रुपदस्य निवेशने ।
स्वयंवरो महांस्तत्र भविता सुमहाधनः ॥ ५ ॥
**ब्राह्मणोंने कहा—**आज ही पंचालदेशको चलिये। वहाँ राजा द्रुपदके दरबारमें महान् धन-धान्यसे सम्पन्न स्वयंवरका बहुत बड़ा उत्सव होनेवाला है ॥ ५ ॥