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सर्वकोश
महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

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पृष्ठ 1233

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त्रिसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः

गन्धर्वका वसिष्ठजीकी महत्ता बताते हुए किसी श्रेष्ठ ब्राह्मणको पुरोहित बनानेके लिये आग्रह करना

वैशम्पायन उवाच

स गन्धर्ववचः श्रुत्वा तत् तदा भरतर्षभ ।
अर्जुनः परया भक्त्या पूर्णचन्द्र इवाबभौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ जनमेजय! गन्धर्वका यह कथन सुनकर अर्जुन अत्यन्त भक्तिभावके कारण पूर्ण चन्द्रमाके समान शोभा पाने लगे ॥ १ ॥

उवाच च महेष्वासो गन्धर्वं कुरुसत्तमः ।
जातकौतूहलोऽतीव वसिष्ठस्य तपोबलात् ॥ २ ॥
फिर महाधनुर्धर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने गन्धर्वसे कहा—'सखे! वसिष्ठके तपोबलकी बात सुनकर मेरे हृदयमें बड़ी उत्कण्ठा पैदा हो गयी है ॥ २ ॥

वसिष्ठ इति तस्यैतदृषेर्नाम त्वयेरितम् ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं यथावत् तद् वदस्व मे ॥ ३ ॥
‘तुमने उन महर्षिका नाम वसिष्ठ बताया था। उनका यह नाम क्यों पड़ा? इसे मैं सुनना चाहता हूँ। तुम यथार्थ रूपसे मुझे बताओ ॥ ३ ॥

य एष गन्धर्वपते पूर्वेषां नः पुरोहितः ।
आसीदेतन्ममाचक्ष्व क एष भगवानृषिः ॥ ४ ॥
‘गन्धर्वराज! ये जो हमारे पूर्वजोंके पुरोहित थे, वे भगवान् वसिष्ठ मुनि कौन हैं? यह मुझसे कहो' ॥ ४ ॥

गन्धर्व उवाच

ब्रह्मणो मानसः पुत्रो वसिष्ठोऽरुन्धतीपतिः ।
तपसा निर्जितौ शश्वदजेयावमरैरपि ॥ ५ ॥
कामक्रोधावुभौ यस्य चरणौ संववाहतुः ।
इन्द्रियाणां वशकरो वसिष्ठ इति चोच्यते ॥ ६ ॥
गन्धर्वने कहा— वसिष्ठजी ब्रह्माजीके मानस पुत्र हैं। उनकी पत्नीका नाम अरुन्धती है। जिन्हें देवता भी कभी जीत नहीं सके, वे काम और क्रोध नामक दोनों शत्रु वसिष्ठजीकी तपस्यासे सदाके लिये पराभूत होकर उनके चरण दबाते रहे हैं। इन्द्रियोंको वशमें करनेके कारण वे वसिष्ठ कहलाते हैं ॥ ५-६ ॥

यस्तु नोच्छेदनं चक्रे कुशिकानामुदारधीः ।