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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 65 of 404

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Page 65

भाषाटीकासमेत । ( ४७ )
अथातिसारनिदानम् ।
पित्तज्वरमें अतिसार होता है तथा ज्वरको और अतिसारको अन्योन्य उपद्रव
होनेसे ज्वरके अनन्तर अतिसार रोगको कहते हैं-
गुर्वतिस्निग्धतीक्ष्णोष्णद्रवस्थूलातिशीतलैः । विरुद्धाध्यशना-
जीर्णेर्विषमैश्चातिभोजनैः ॥ १ ॥ स्नेहाद्यैरतियुक्तैश्च मिथ्यायुक्तै-
र्विषैर्भयैः । शोकदुष्टाम्बुमद्यातिपानैः सात्म्यर्तुपर्ययैः ॥ २ ॥
जलाभिरमणैर्वेगविघातैः कृमिदोषतः । नृणां भवत्यतीसारो
लक्षणं तस्य वक्ष्यते ॥ ३ ॥
प्रमाणसे अधिक भोजन करनेसे अथवा स्वभावसे भारी पदार्थ जैसे उड़द आदिक
खानेसे और अतिचिकनी अतितीखी अतिगरम अत्यन्त पतली स्थूल अर्थात्
जिसके अवयव कठिन हों जैसे लड्डू, घेवर, गूंझा इत्यादि और अत्यन्त शीतल
स्पर्शसे तथा वीर्यसे विरुद्ध जैसे क्षीर मत्स्य इत्यादिक, अध्यशन कहिये पूर्व दिनका
भोजन परिपाक नहीं होय और उसपर भोजन करना, अन्नके बिना पके, नित्य
भोजनके समयको त्यागकर और समय थोडा वा बहुत ऐसे भोजनोंके करनेसे स्नेह
स्वेद आदि पंचकर्मसे, अत्यन्त योगके करनेसे वा थोडे योग करनेसे स्थावरादिक
दूषीविषके खानेसे, भयसे, सोच करनेसे, अतिदुष्ट जलके पीनेसे तथा अतिमद्यके
पीनेसे सात्म्य और ऋतुके पलटनेसे, जलमें अतिक्रीडा करनेसे, मल मूत्र आदि
वेगोंको रोकनेसे, कृमिरोगके उपद्रवसे अथवा कृमिजनित वातादिकके कोपसे
मनुष्योंको अतिसार रोग होता है, इन लक्षणोंसे यह निदान यथासम्भव वातादि-
दोषोंका जानना । आगे अतिसारके लक्षण कहते हैं ॥
अतिसाररोगकी संप्राप्ति ।
संशम्यापां धातुरग्निं प्रवृद्धो वर्चोमिश्रो वायुनाऽधः प्रणुन्नः ।
सार्यैतातीवातिसारं तमाहुर्व्याधिं घोरं षड्विधं तं वदन्ति ।
एकैकशः सर्वशश्चापि दोषैः शोकेनान्यः षष्ठ आमेन चोक्तः ॥ ४॥
पूर्वोक्त कुपथ्यसे अत्यन्त दुष्ट हुए शरीरमें रस, जल, मूत्र, स्वेद, मेद, कफ,
पित्त, रुधिर इत्यादि जलरूप धातु अग्निको मन्द कर और वही जल मलमिश्रित
१ तदुक्तं चरके-“ भुक्तं पूर्वाह्णशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् ।
“ २ बहुतोकमकाले च तज्ज्ञेयं विषमाशनम् ॥”