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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 64 of 404

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Page 64

( ४६ ) माधवनिदान ।
२--मन्दवायु ।
जिस समय पृथ्वीमें वर्षाका अथवा और प्रकार जल सूखे उसमें घास पत्ता सड़-
जावें तब इनसे मन्द वायु अथवा बाष्प उत्पन्न होय तिसके द्वारा अनेक प्रकारके
ज्वर प्रगट होवें, विशेषकरके आमज्वरकी अधिक उत्पत्ति होय इसीसे जलाशयस्थान
तालाब आदि और झील खाल इन स्थानोंमें मन्दवायु अधिक होता है इससे नाना
प्रकारके ज्वर प्रगट होयँ, यह हवा सोताके जलसे उत्पन्न नहीं होय है किन्तु जिस
जगह थोडा जल होय जैसे तलैया आदि उसमें घाम लगनेसे जल पक्व होकर गन्ध
वायुको अधिक उत्पन्न करे है यह वायु दिनमें सूर्य्यकी किरणसे बहुत हल्की
होकर ऊपरको उठे इसीसे यह बड़ा नुकसान करनेवाली होती है और सन्ध्या
तथा रात्रिमें यह वायु शीतल होनेसे नीचे उतर सर्व साधारण मनुष्योंको नुकसान
करनेवाली होती है और हवाओंसे यह हवा अधिक भारी होती है, घरके किंवाड
लगानेसे यह हवा घरके भीतर कम जाती है इसीसे घरके किंवाड देकर मसेरी जिसको
पूर्वके लोग बहुधा रखते हैं यह कपडेकी बनी हुई होती है इसमें सोना चाहिये ॥
३--गरिष्ठ भोजन ।
जो मनुष्य भारी द्रव्य भोजन करे तब उसके वह पचै नहीं और पेटमें पीडा
करे उस पीडाके होनेसे ज्वर उत्पन्न होय, विशेषकरके यह ज्वर बालकोंके होता है ॥
अनेकप्रकारके ज्वरोंके लक्षण ।
नाडी और श्वास जल्दी चले, मस्तकमें पीडा होय, त्वचा शुष्क और गरम
होय प्रलाप होय अथवा न होय पेशाब लाल उतरे, जीभ मलीन होय, शरीरमें सदा
ज्वर रहाकरे कभी कम होजाय कभी जियादह हो जाय ॥
कुंकुमज्वरके लक्षण ।
श्वास लेते समय मन्द मन्द पीडा होय, खांसी हो, कफ कुछ नीले रंगका गिरे,
ज्वर अल्प होय, वक्षस्थलमें पीडा होय, खांखते समय श्वास जल्दी चले, नाडी कुछ
कुछ थोडी और शीघ्र चले, त्वचा सदैव थोडी गरम रहे; जिस समय रोगकी वृद्धि
होय, स्वासके चलनेसे पीडा होय और अधिक पीडा होय उस रोगके आरम्भमें
कफ नहीं निकले किन्तु दो तीन दिनके बाद कफसमेत निकल पडे उस रोगीका
हल्दीके समान पीला वर्ण होय, कभी कभी जलके सदृश वर्ण होय इस रोगकी
विशेषता होनेसे कफ पतला होजाय, यह रोग अत्यन्त बढकर पचनेको होय तब
कफका शाकके समान रंग हो अथवा काले रंगका और दुर्गन्धयुक्त होय बहुत शरदी
पडनेसे इसकी उत्पत्ति होती है ॥
यकृत वा कलेजाइज्वरके लक्षण ।
दहने पाँसूमैं पीडा होय, शरीरमें थोडा ज्वर होय तथा आहारमें अरुचि होय
जीभ मलिन, नेत्र पीले होयँ, मल मिट्टीके रंगका अथवा सफेद तथा काला होय
और कठिन, पेशाब लाल होय ॥

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA