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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 62 of 404

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Page 62

( ४४ ) माधवनिदान ।
युक्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् । संततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षप-
यति ज्वरः ॥ ७०॥ हतप्रभेन्द्रियं क्षाममरोचकनिपीडितम् ।
गम्भीरतीक्ष्णवेगात्तं ज्वरितं परिवर्जयेत् ॥ ७१ ॥
जिसके देहमें रोमांच खडे रहें, लालनेत्र हों, हृदयमें गांठ होनेसे जैसी पीडा हो वैसा
हो और संघात इस पदका यह अर्थ करते हैं कि, नाना प्रकारका शूल हो मुखके द्वारा
श्वास ले वह ज्वर रोगी मनुष्यको मार डाले । हिचकी श्वास प्यास इन करके व्याप्त
हो, मोहयुक्त हो चलायमान नेत्र हों, निरंतर श्वास ले ऐसे लक्षणयुक्त मनुष्यको ज्वर
मार डालता है। इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होनेसे और शरीरकी कांति निस्तेज होनेसे
अथवा इन्द्रिय ( नाक कान नेत्र ) ये नष्ट हो जावें, देह कृश हो जावे, अरुचिसे
अत्यंत पीडित हो “अरोचकनिपीडितम्” इसका इस जगह जैज्जटने दो पाठ लिखे
हैं एक तो— “दुरात्मानमुपद्रुतम्” इसका अर्थ यह है कि, दुष्ट अंतःकरण होवे और
उपद्रवयुक्त होवे । दूसरा पाठ यह है कि “दुरात्मभिरुपद्रुतम्” अर्थात् राक्षसादि-
करके युक्त हो तथा अतिघोर अन्तर्वेग करके परिपीडित हो ऐसे ज्वरवान् पुरुषको
वैद्य छोडदेवे। इसी जगह कई एक टीकाकारोंने जो असाध्यलक्षण लिखे हैं सो आतंक-
दर्पण तथा मधुकोश टीकासे लिखे हैं वे सब वाग्भट और हारीतके कालज्ञान देख-
नेसे निश्चय हो जायँगे सो लेवे, इस जगह हम ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखते ॥
ज्वरमुक्तिके पूर्वरूप ।
दाहः स्वेदो भ्रमस्तृष्णा कम्पो विड्भिदसंज्ञिता ।
कूजनं चातिवैगन्ध्यमाकृतिर्ज्वरमोक्षणे ॥ ७२ ॥
दाह, पसीना, भ्रम, प्यास, कंप, मलका पतला होना, संज्ञाका नाश होना,
गूंजे, देहमें अत्यंत दुर्गंध आवे ये लक्षण ज्वर छोडता है तब होते हैं. शंका--क्यों जी !
दोष ( वात पित्त कफ ) नाशके बिना रोगकी निवृत्ति होय नहीं और जब
दोष क्षीण होगये तो उस दाहादिलक्षण कैसे करते हैं ? उत्तर--इसका कारण
यह है कि, कोई एक वस्तुका ऐसा स्वभाव है कि क्षीण होनेके समयमें अपनी
शक्तिको दिखाती है जैसे दीपकमें तेल नहीं रहे और थोडी देर बलकर शांत हो
जाता है ऐसेही जब दोष शांत होनेको होते हैं तब अपनी शक्ति दाहादिकोंको
दिखाते हैं । अथवा दूसरा उत्तर यह है कि, जैसे बंदर वृक्षकी डालीको हिलायकर
दूसरे स्थानपर चलाजाता है परन्तु वह वृक्षकी डाली बहुत देरपर्यंत हिला करती
है इसी प्रकार ज्वर गयेपर भी उसके असरसे दाहादिक रहते हैं यह लक्षण दाहसे
आदि ले त्रिदोष ज्वरके शांत होनेके समय होते हैं और सब ज्वरोंमें नहीं होते और
ज्वरमें केवल पसीने ही आते हैं यह भालुकी आचार्यका मत है ॥