माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context( ३६८ ) माधवनिदान ।
थोडी पीडा होय, सामुद्र, परिमण्डल हस्तिमस्तक, कृष्णा, पर्वतीय ये पांच भेद
मच्छरोंके हैं ॥
असाध्य मशकक्षतके लक्षण ।
असाध्यकीटसदृशमसाध्यमशकक्षतम् ॥ ५४ ॥
पर्वतके ऊपर रहनेवाले मच्छर अथवा डांसके काटनेके क्षत असाध्य कीटके
समान असाध्य है । असाध्य कीटके विषके लक्षण सुश्रुतमें लिखे हैं सो जान लेने ॥
सविषमक्षिका ( मक्खी ) दंशके लक्षण ।
सद्यः प्रस्राविणी स्याद्वा दाहमूर्च्छाज्वरान्विता ।
पिडिका मक्षिकादंशे तासां तु स्थविकाऽसुहृत् ॥ ५५ ॥
विषैले मक्खीके काटनेके ठिकाने काली फुन्सी प्रगट होय, वह तत्क्षण बहने लगे,
उस ठिकाने दाह होय और मूर्च्छा, ज्वर होय । इनमें स्थविका नाम मक्खी प्राण-
हर्त्री जाननी । मक्खीके छः भेद हैं-जैसे कान्तारिका, कृष्णा, पिंगलिका, मधूलिका,
काषायी और स्थविका, इनमें काषायी और स्थविका दो असाध्य हैं ॥
चतुष्पादादिकोंके विषके साधारण लक्षण ।
चतुष्पद्भिर्द्विपद्भिर्वा नखदन्तविषं च यत् ।
पूयते पच्यते चापि स्रवति ज्वरयत्यपि ॥ ५६ ॥
व्याघ्रादि चतुष्पाद और वनमनुष्यादि वानरादि द्विपाद इनके नखदांतोंके
विषसे सूज आवे, पकजावे, बहे तथा इसके योगसे ज्वर आवे ॥ अब कहते हैं कि,
श्रीमाधवाचार्यने विश्वंभरा, अहिंडूका, कण्डूमका, शुकवृन्तादि, पिपीलिका,
गोधेरका और सर्षपिका इनके विषका निदान नहीं लिखा परन्तु इनका निदान
सुश्रुतमें कहा है सो ग्रन्थकी परिशिष्टमें लिखेंगे ॥
विष उतरगया हो उसके लक्षण ।
प्रसन्नदोषं प्रकृतिस्थधातुमन्नाभिकांक्षं सममूत्रविट्कम् ।
प्रसन्नवर्णेन्द्रियचित्तचेष्टं वैद्योऽवगच्छेदविषं मनुष्यम् ॥ ५७ ॥
जिस पुरुषके वातादि दोष निर्मल होयँ, रस रक्तादि धातु निरोग अवस्थामें जैसे
होते हैं वैसेही होयँ, अन्न खानेकी इच्छा होय, मलमूत्र जैसे होते हैं वैसे होय
शरीरका वर्ण, इन्द्रिय मन और व्यापार ( देहकी चेष्टा ) ये जिसके शुद्ध होयँ
उसका विष उतरगया ऐसे वैद्य जाने ॥
इति श्रीमाथुरकुलकमलप्रकाशक श्रीमत्कन्हैयालालपाठकतनयदत्तरामानिर्मित-
माधवभावार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां विषरोगनिदानं समाप्तम् ॥
इति माधवनिदानं समाप्तम् ॥