Skip to content
SarvaKosh
माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 376 of 404

Read in context
Page 376

( ३५८ ) माधवनिदान ।
जिस पुरुषका जखम तत्काल पकजावे तथा उसमेंसे रुधिर वहै और वारंवार
पके तथा उस जखममेंसे काला सडा दुर्गन्धयुक्त ऐसा मांस निकले तथा जिसमें
प्यास, मूर्च्छा, ज्वर, दाह ये होवें उसके विषमें बुझे वा लिप्त शस्त्रकी जखम लगी
जानना चाहिये । शत्रुओंने कपट करके जिसके व्रणमें विष डालदिया हो उसके भी
यही लक्षण हैं ॥
स्थावरविषको कहकर जंगममें सर्पविष ये अतितीक्ष्ण हैं.
इसीसे प्रथम सर्पोंकी जाति कहते हैं-
वातपित्तकफात्मानो भोगिमण्डलिराजिलाः ।
यथाक्रमं समाख्याता द्वयन्तरा द्वंद्वरूपिणः ॥ १६ ॥
भोगी मण्डली और राजिल ये सर्प अनुक्रमसे वात, पित्त, कफप्रकृतिके हैं और
जो द्वयंतर अर्थात् दो जातिके सर्प और सर्पिणीसे प्रगट हैं वे द्वयंतर कहाते हैं।
उनकी प्रकृति द्वंद्वज है अर्थात् जिस जिस प्रकारके सर्प सर्पिणीसे प्रगट हैं उसी
उसी प्रकारकी प्रकृति उनकी होती है, जिनके मस्तकपर चक्र, हल, छत्र, स्वास्तिक
(सतिया), अंकुश इनका चिह्न हो और जिनका फण करछीके समान चौडा हो
और जल्दी चलनेवाले हों उनको भोगी अथवा राजिल सर्प कहते हैं और
जो अनेक प्रकारके चकत्तोंसे चित्रविचित्र हों तथा मोटे और मन्द चलनेवाले
तथा अग्नि और सूर्यकासा प्रकाश जिनका उनको मण्डली सर्प कहते हैं और
जो चिकने और अनेक प्रकारकी रेखा उनके ऊपर नीचे विद्यमान हों उनको
राजिल सर्प कहते हैं । इन सर्पोंकी चार जाति हैं । जिनमें मोती, चांदी,
सुवर्णकीसी प्रभा होवे और जो नम्र तथा जिनकी देहमें सुगंध आवै वे ब्राह्मण
जातिके सर्प हैं और जिनका स्वच्छवर्ण, क्रोधी और जिनके मस्तकपर सूर्य
चन्द्रके समान छत्र तथा कमलका चिह्न होवे वे क्षत्रिय जातिके सर्प हैं। काले
और हीरेके समान तथा लोहेके वर्ण हों और जिनकी धूआं और कबूतरके
समान प्रभा हो वे वैश्यजातिके सर्प हैं। जिनकी देह भैंसा, चीतेके समान हो
और जिनकी त्वचा कठोर हो तथा अनेक प्रकारका जिनका वर्ण होवे वे शूद्र-
जातिके सर्प हैं। रात्रिके पिछले प्रहरमें राजिल जातिके सर्प विचरते हैं और रात्रिके
पहिले तीन पहरोंमें मण्डली जातिक सर्प विचरते हैं और दिनमें दर्वीकर जातिके
सर्प बहुधा विचरते हैं। इनमें दर्वीकर जातिके सर्प तरुण हैं और मंडली जातिके
वृद्ध, राजिलजातिके मध्यम अवस्थाके हैं। इतनी जातिके सर्प निर्विष जानने। जो
नोलेसे हत हैं और बालक तथा जलसे ताडित हैं और कृश, वृद्ध तथा जिनकी
कांचली छूट रही हो और डररहे हों ऐसे सर्प विषरहित होते हैं ॥