माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in contextभाषाटीकासमेत । ( ३५७)
सो इस प्रकार-जो मनुष्य विष दे उससे कोई बात पूछे तो वह उत्तर न दे और जब
बोले तब मोहको प्राप्त हो अर्थात् घबडा जावे तथा कदाचित् बोले भी तो निरर्थक
और बहुत अस्पष्ट बोले तथा अकस्मात् हँसे, हाथकी उंगली चटकावे, पृथ्वीमें रेखा
काटे, भयसे कांपे और डरकर चारों ओर वारंवार सबकी तरफ देखे, मुखकी
चेष्टा जाती रहे और काला होजाय, नखोंसे कुछ तिनका आदि तोडे, गरीबके
समान एकही स्थानपर बैठा रहे, माथेपर हाथ फेरे, वारंवार इधर उधर डोल कर
बैठजाय, उसका चित्त ठिकाने न रहे तथा उसका चित्त भागनेको चाहे । ये लक्षण
विष देनेवालेके जानने और यही लक्षण घोर अपराध करनेवालेके राजा जान लेवे ॥
मूलादिविषोंके लक्षण ।
उद्वेष्टनं मूलविषैः प्रलापो मोह एव च ।
जृम्भणं वेपनं श्वासो मोहः पत्रविषेण तु ॥ १० ॥
मुखशोथः फलविषैर्दाहोऽन्नद्वेष एव च ।
भवत्युपविषैश्छर्दिराध्मानं श्वास एव च ॥ ११ ॥
त्वक्सारनिर्यांसविषैरुपयुक्तैर्भवंति हि ।
आस्यदौर्गन्ध्यपारुष्यशिरोरुकफसंस्रवाः ॥ १२ ॥
फेनागमः क्षीरविषैर्विद्भेदो गुरुजिह्वता ।
हृत्पीडनं धातुविषैर्मूर्च्छा दाहश्च तालुनि ।
प्रायेण कालघातीनि विषाण्येतानि निर्दिशेत् ॥ १३ ॥
मूलविषसे रोगीके हाथ पैरोंमें पीडा और मोह होवे । पत्रविषसे जम्भाई, कंप
श्वास और मोह होवे । फलविषसे मुखपर सूजन, दाह, अन्नमें अरुचि होवे । पुष्प-
विषसे वमन, अफरा और श्वास होवे । छाल, रस, गोंद-इनसे मुखमें दुर्गन्ध,
अंगमें खरदरापन, मस्तकशूल और मुखके मार्ग कफ गिरे । दुग्धविषसे मुखमें
झाग आवे, दस्त होय और जीभ जकड जावे । धातुविषसे हृदयमें पीडा होय,
मूर्च्छा आवे, तालुएमं दाह होय ये विष बहुधाकरके कालान्तरमें मारनेवाले हों ॥
विषलिप्तशस्त्रहतके लक्षण ।
सद्यः क्षतं पच्यते तस्य जंतोः स्रवेद्रक्तं पच्यते चाप्यभीक्ष्णम् ।
कृष्णीभूतं क्लिन्नमत्यर्थपूति क्षतान्मांसं शीर्यते यस्य चापि ॥ १४ ॥
तृष्णा मूर्च्छा ज्वरदाहौ च यस्य दिग्धाहतं मनुजं तं व्यवस्येत् ।
लिंगान्येतान्येव कुर्यादमित्रैर्व्रणे विषं यस्य दत्तं प्रमादात् ॥ १५ ॥