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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 337 of 404

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Page 337

भाषाटीकासमेत । (३१९)
न होयँ ऐसा शुक्र कदाचित् अच्छा भी हो जाय परन्तु इनसे विपरीत लक्षण
दृष्टिके समीप होना, दूसरी त्वचा में होय, बहुत स्रवे, पीडा होय, एक स्थानमें
दो बूंद होयँ यह शुक्र अच्छा नहीं होय ॥
अव्रणशुक्र लक्षण ।
स्यन्दात्मकं कृष्णगतं सचोषं शंखेन्दुकुन्दप्रतिमावभासम् ।
वैहायसाभ्रप्रतनु प्रकाशमथाव्रणं साध्यतमं वदंति ॥ २५ ॥
अभिष्यन्दसे उत्पन्न होकर नेत्रोंके काले भागमें चोष कहिये सींग तुमडीकी पीडा
युक्त, शंख, चन्द्र, कुन्दपुष्प इनके समान सफेद, आकाशके समान पतला ऐसा
जो व्रणरहित शुक्र होय उसको सुखसाध्य कहते हैं ॥
अव्रणशुक्र अवस्थाविशेष करके साध्य होय है, सो कहते हैं-
गम्भीरजातं बहलं च शुक्रं चिरोत्थितं वापि वदंति कृच्छ्रम् ॥ २६ ॥
जो शुक्र गंभीर हो अर्थात् दो तीन त्वचाके भीतर हुआ हो तथा मोटा हो
उसको कृच्छ्रसाध्य कहते हैं ॥
अव्रण अवस्थाभेद करके असाध्य होता है, उसको कहते हैं-
विच्छिन्नमध्यं पिशितावृतं वा चलं शिरासूक्ष्ममदृष्टिकृच्च ।
द्वित्वग्गतं लोहितमन्ततश्च शिरोत्थितं चापि विवर्जनीयम् ॥ २७ ॥
जो शुक्रके बीचका मांस गिर जाय, इसीसे शुक्रके स्थानमें गडेला हो जाय
अथवा इसके विपरीत कहिये पिशितावृत अर्थात् उसके चारों ओर मांस होय, चंचल
कहिये एक ठिकाने न रहे, शिराओं करके व्याप्त हों, बारीक हो गया हो, दृष्टि
नाश करनेवाला यह 'दृष्टेःसमीपेन भवेत्' इसका उलटा है, दो पटल कहिये पर-
दोंके भीतर भया हो, चारों ओरसे लाल हो और बीचमें सफेद और बहुत दिनका
शुक्र हो ऐसेको वैद्य त्याग दे ॥
दूसरे असाध्य लक्षण ।
उष्णाश्रुपातः पिडिका च नेत्रे यस्मिन्भवेन्मुद्गनिभं च शुक्रम् ।
तदप्यसाध्यं प्रवदंति केचिदन्यच्च यत्तित्तिरिपक्षतुल्यम् ॥ २८ ॥
जिसके नेत्रोंसे गरम अश्रुपात (आँसू) गिरकर पिडिका उत्पन्न होवे (दो
पटलमें शुक्र जानेसे ये लक्षण होते हैं) तथा जिसमें मूंगकी बराबर शुक्र होवे ऐसा
नेत्रका शुक्र असाध्य है और जो तीतरके पंखके समान (काले रंगका) होवे उसकी
भी कोई २ असाध्य कहते हैं ॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA