माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
by माधवकर
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
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Read in context( ३१८ ) माधवनिदान ।
शिरोत्पातके लक्षण ।
अवेदना वापि सवेदना वा यस्याक्षिराज्यो हि भवन्ति ताम्राः ।
मुहुर्विराज्यन्ति च याः सदा दृग्व्याधिः शिरोत्पात इतिप्रदिष्टः ॥२१॥
जिसके नेत्रकी नस पीडासहित अथवा पीडारहित तांबेके समान लाल रंगकी
होजायँ और वे सब बराबर अधिकाधिक ( जियादहसे जियादह ) लाल होजायें,
इस रोगको शिरोत्पात ( सबलवायु ) कहते हैं। यह रोग रक्तजन्य है ॥
शिराहर्षके लक्षण ।
मोहाच्छिरोत्पात उपेक्षितस्तु जायेत रोगस्तु शिराप्रहर्षः ।
ताम्राभमस्रं स्रवति प्रगाढं तथा न शक्नोत्यभिवीक्षितुं च ॥ २२ ॥
अज्ञानकरके शिरोत्पात ( सबल वायु ) की उपेक्षा करनेसे अर्थात् इलाज न
करनेसे शिराप्रहर्षरोग होता है उसमें नेत्रोंसे लाल स्वच्छ ऐसे आंसू गिरें और उस
रोगीको नेत्रोंसे कुछ दिखाई न देवे ॥ इति सर्वनेत्रगता रोगाः ॥
कृष्णज रोग ।
अब नेत्रोंके काले रंगका होनेवाले रोग कहते हैं-
सव्रणशुक्र लक्षण ।
निमग्नरूपं तु भवेद्धि कृष्णे सूच्येव विद्धं प्रतिभाति यद्वै ।
स्रावं स्रवेदुष्णमतीव यच्च तत्सव्रणं शुक्रमुदाहरंति ॥ २३ ॥
नेत्रके काले भागमें शुक्र कहिये फूलसा हो जाय और वह भीतरसे गडासा हो
जाय, उसमें सुई चुभानेकीसी पीडा होवे तथा नेत्रोंसे अति गरम और बहुतस
स्राव होवे, इस रोगको सव्रणशुक्र कहते हैं, इसमें पीडा बहुत होती है, क्षतमें
पीडा होना ठीकही है और नेत्रसरीखे सुकुमार ठिकानेपर तो विशेष पीडा होती है
ऐसे भोजविदेहादिकोंका मत है ॥
सव्रणशुक्रके साध्यासाध्य लक्षण ।
दृष्टेः समीपे न भवेत्त यत्तु न चावगाढं न च संस्रवेद्धि ।
अवेदनं वा न च युग्मशुक्रं तत्सिद्धिमायाति कदाचिदेव ॥ २४ ॥
जो शुक्र ( फूल ) दृष्टिके समीप होय नहीं और एक त्वचा में होय, बहुत
स्रवे ( झरे ) नहीं, जिसम पीडा न होय और एकही स्थानमें दो बूंद ( फूल )