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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 320 of 404

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Page 320

( ३०२ ) माधवनिदान ।
स्वरघ्नो वलयो वृन्दो बलासश्च विदारिका ।
गलौघो मांसतानश्च शतघ्नी रोहिणी गले ॥ ६३ ॥
असाध्याः कीर्त्तिता ह्येते रोगा नव दशैव तु ।
तेषु चापि क्रियां वैद्यः प्रत्याख्याय समाचरेत् ॥ ६४ ॥
ओष्ठरोग (होठके रोगों) में मांसज, रक्तज और त्रिदोषज असाध्य हैं, मसूढोंके
रोगोंमें सन्निपात, नाडी और शौषिर, दांतोंके रोगोंमें श्याव, दालन और भञ्जन,
जिह्वाके रोगोंमें बलास और तालुएक रोगोंमें अर्बुद, तथा गलेके रोगोंमें स्वरघ्न,
वलय, वृन्द, बलास, विदारिका, गलौघ, मांसतान, शतघ्नी और रोहिणी ये उन्नीस
रोग असाध्य हैं, इनपर चिकित्सा करनेवाले वैद्यको प्रत्याख्यान (नटकर) अर्थात्
असाध्य कहकर औषध देनी, क्योंकि इसकी मृत्यु निश्चय होय और कदाचित्
बच भी जाय ऐसे विचारकर औषधी तो देनी ही चाहिये ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां
मुखरोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथ कर्णरोगनिदानम् ।
कर्णशूलके लक्षण ।
समीरणः श्रोत्रगतोऽन्यथा चरन् समंततः शूलमतीव कर्णयोः ।
करोति दोषैश्च यथास्वमावृतः स कर्णशूलः कथितो दुरासदः ॥ १ ॥
कानमें वायु दोषोंकरके (कफ पित्त रुधिरसे) आवृत होकर कानोंमें उलटी
फिरे तब अत्यन्त शूल (दरद) होय इस रोगको कर्णशूल कहते हैं । यह रोग
कष्टसाध्य है, कर्णशूलके उपद्रव विदेहने इस प्रकार लिखे हैं- “मूर्च्छा दाहो ज्वरः
कासः क्लमोऽथ वमथुस्तथा । उपद्रवाः कर्णशूले भवन्त्येते भविष्यतः ॥” इति ॥
कर्णनादके लक्षण ।
कर्णस्रोतःस्थिते वाते शृणोति विविधान्स्वरान् ।
भेरीमृदंगशंखानां कर्णनादः स उच्यते ॥ २ ॥
वायु कानके छिद्रमें स्थित होनेसे अनेक प्रकारके स्वर तथा भेरी मृदंग और
शंख इनके शब्द सुनाई देवे, इस रोगको कर्णनाद कहते हैं ॥
१ कर्णशब्देन च कर्णशष्कुल्यवच्छिन्नमदृष्टोपगृहीतं श्रोत्रमुच्यते ।