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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 319 of 404

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Page 319

भाषाटीकासमेत । ( ३०१ )
मांसतानके लक्षण ।
प्रतानवान् यः श्वयथुः सुकष्टो गलोपरोधं कुरुते क्रमेण ।
स मांसतानेति बिभर्ति संज्ञां प्राणप्रणुत्सर्वकृतो विकारः ॥ ५७ ॥
जो सूजन गलेमें उत्पन्न होकर क्रमसे फैलकर गलेको रोक ले तब बहुत कष्ट
हो। इस त्रिदोष विकारको मांसतान कहते हैं । यह विकराल रोग प्राणोंका नाश
करनेवाला है ॥
विदारीके लक्षण ।
सदाहतोदं श्वयथुं सुतीव्रमन्तर्गले पूतिविशीर्णमांसम् ।
पित्तेन विद्याद्वदने विदारीं पार्श्वे विशेषात्स तु येन शेते ॥ ५८ ॥
पित्तसे गलेमें सूजन होवे तिस करके दाह होय, चबक होय, तथा दुर्गंधियुक्त
सड़ा मांस गिरे और रोगी जिस करवट सोवे उसी तरफ वह रोग होता है मांसके
विदारण करनेसे यह विदारी कहलाता है ॥
मुखपाक ।
सर्वसर ( मुखपाक मुख आना ) तीन प्रकारका है ।
वातजके लक्षण ।
स्फोटैः सतोदैर्वदनं समन्ताद्यस्याचितं सर्वसरः स वातात् ।
वादीके योगसे मुखमें सर्वत्र छाले होजायँ वह चिनमिनावें, मुख जिह्वा गला होंठ
मसूढे दांत तालु इन सबमें व्याधि होनेसे इस रोगको सर्वसर कहते हैं ॥
पित्तजके लक्षण ।
रक्तैः सदाहैः पिडकैः सपीतैैर्यस्याचितं चापि स पित्तकोपात् ॥५९॥
पित्तसे मुखमें लाल तथा पीले छाले होयँ और दाह होवे ॥
कफजके लक्षण ।
अवेदनैः कण्डुयुतैः सवर्णैर्यस्याचितं चापि स वै कफेन ॥ ६० ॥
कफसे मुखमें मन्दपीडा और त्वचाके समान वर्ण जिनका ऐसे छाले सर्वत्र होयँ॥
असाध्य मुखरोगके लक्षण ।
ओष्ठप्रकोपे वर्ज्याः स्युर्मांसरक्तप्रकोपजाः ।
दन्तमूलेषु वर्ज्यौ तु त्रिलिंगगतिशौषिरौ ॥ ६१ ॥
दन्तेषु न च सिध्यन्ति श्यावदालनभञ्जनाः ।
जिह्वागले बलासश्च तालव्येष्वर्बुदं तथा ॥ ६२ ॥

CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA