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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 217 of 404

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Page 217

भाषाटीकासमेत । (१९९)
अब कहते हैं कि, कोई कृश भी बलवान् होय हैं इसमें क्या हेतु है ?-
आधानसमये यस्य शुक्रभागोऽधिको भवेत् ।
मेदोभागस्तु हीनः स्यात्स कृशोऽपि महाबलः ॥ ७ ॥
गर्भ रहनेके समय शुक्रका भाग अधिक होय और मेदका भाग थोडा होय तो
मेद् थोडे होनेसे तो कृश होय और शुक्राधिक्य होनेसे बलवान् होय ॥
कोई स्थूल होनेपर निर्बल होता है इसका कारण कहते हैं-
मेदसोंऽशोऽधिको यस्य शुक्रभागोऽल्पको भवेत् ।
स स्निग्धोऽपि सुपुष्टोऽपि बलहीनो विलोक्यते ॥ ८ ॥
गर्भ रहते समय मेदका भाग अधिक होय और शुक्रका भाग थोडा होय तो
वह पुष्ट भी है परन्तु बलहीन होता है ॥
यथा पिपीलिका स्वल्पा यथा च वरटी बलात् ।
स्वतश्चतुर्गुणं भारं नीत्वा गच्छति सम्मुखम् ॥ ९ ॥
दृष्टान्त-जैसे पिपीलिका (चैंटी) आप अतिकृश है और खानेकी वस्तु दाल
चावल आदि भारी भी हैं परन्तु उनको खींचकर बिलमें लेजाती है और वरटी
(पीली झांखी) झींगर आदि आपसे चौगुना भारी भी हो परन्तु खींचकर अपने
स्थानमें लेजाती है इसी प्रकार बलवान् पुरुष जानना ॥
असाध्यकार्श्य कहते हैं-
स्वभावात्कृशकायो यः स्वभावादल्पपावकः ।
स्वभावादबलो यश्च तस्य नास्ति चिकित्सितम् ॥ १० ॥
जिसका स्वतः स्वभावसे कृश शरीर है और जिसकी स्वभावसे मन्दाग्नि है और
जो स्वभावसे बलहीन है उसकी चिकित्सा नहीं है ॥
इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाधुरीभाषाटीकायां
कार्श्यरोगनिदानं समाप्तम् ॥
अथोदररोगनिदानम् ।
अग्निका दुष्ट होना यही उदररोगका विशेषकरके कारण है-
रोगाः सर्वेऽपि मन्देऽग्नौ सुतरामुदराणि च ।
अजीर्णान्मलिनैश्चान्नैर्जायन्ते मलसञ्चयात् ॥ १ ॥
१ तेषामग्निबले हीने कुप्यंति पवनादयः । इति । २ तात्स्थ्यतद्धर्मताभ्यां च तत्समीप-
तयापि च । तत्साहचर्याच्छब्दानां वृत्तिरेषा चतुर्विधा॥ इति । ३अतिसंचितदोषाणां पापकर्म च
कुर्वताम् । उदराण्युपजायन्ते मन्दाग्नीनां विशेषतः ॥
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