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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 216 of 404

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Page 216

( १९८ ) माधवनिदान ।
मीरितम् ॥ २ ॥ क्रोधोऽतिमैथुनं चैव शुक्रव्याधिस्तथैव च ।
कार्श्यस्य हेतवः प्रोक्ताः समस्तैरपि तान्त्रिकैः ॥ ३ ॥
कुपित वायु, रूखा अन्न ( चना कांगुनी सामकिया आदि ) रूक्ष पान ( औटाया
जल आदि ), लंघन, ( थोडा भोजन ), क्रियातियोग कहिये वमन विरेचनका बहुत
होना, शोक ( बन्धुवियोगादिक ), मूत्र मल आदि वेगोंका रोकना, निद्राका रोकना,
नित्य ही रोगी रहना, सर्वदा अरति होना, व्यायाम ( दण्डकसरत ) और मार्गका
चलना आदि श्रम, अतिभय, धन आदिकी चिन्ता, क्रोध, अतिमैथुन, शुक्र, व्याधि-
( प्रमेहरोगदिक ) ये सर्व कार्श्य ( क्षीणता ) होनेके कारण वैद्य कहते हैं ॥
कृश मनुष्यके लक्षण ।
शुष्कस्फिगुदरग्रीवाधमनीजालसन्ततिः ।
अस्थिशेषोऽतिकृशतः स्थूलपर्वा नरो मतः ॥ ४ ॥
जिसके कूले, पेट, गरदन और धमनी कहिये नाडियोंका जाल ये सब सूख
जायँ तथा हड्डी सूख जायँ और पर्व कहिये जोड मोटे होयँ वह पुरुष कृश
( लटा ) कहाता है ॥
अतिकृशको वर्जनीय वस्तु ।
व्यायाममतिसौहित्यं क्षुत्पिपासा महौषधम् ।
न कृशः सहते तद्वदतिशीतोष्णमैथुनम् ॥ ५ ॥
व्यायाम ( दण्डकसरत ) का करना, अतिसौहित्य ( अतितृप्त होवे तबतक
भोजन ), भूख, प्यास, उत्कट औषध तथा अतिशीतलता, अतिगरमी और अति-
मैथुन इनको कृश मनुष्य नहीं सह सके हैं इसीसे इनको त्याग दे ॥
अतिकृशके जो रोग होते हैं उनको कहते हैं-
प्लीहा कासः क्षयः श्वासगुल्मार्शांस्युदराणि च ।
भृशं कृशं प्रधावन्ति रोगाश्च ग्रहणीमुखाः ॥ ६ ॥
जो मनुष्य ज्वरादि रोगोंसे कृश होय अथवा वातरूक्षान्नपानादिकोंसे कृश होय
और वह कुपथ्य करे तौ इतने रोग होयँ जो विदाही और अभिष्यन्दी वस्तु खाय
तौ प्लीहा ( तापतिल्ली ) होय और खटाई खाय तौ खांसी होय और अतिमैथुन करे
तौ क्षयीका रोग होय और व्यायाम शीतल भोजनपानादिक करे तौ श्वास रोग
होय, रूखा अन्नपान कडुवा खट्टा भक्षण और शीतल भारी चिकना आदिका सेवन
करे तो गुल्म ( गोला ) होय और अर्श ( बवासीर ) कारक पदार्थ सेवनसे बवासीर
होय । इसी प्रकार उदररोग संग्रहणी आदि रोग होते हैं ॥