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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 182 of 404

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Page 182

( १६४ ) माधवनिदान ।
वातशूलके कारण और लक्षण ।
व्यायामयानादतिमैथुनाच्च प्रजागराच्छीतजलातिपानात् ।
कलायमुद्गाढकिकोरदूषादत्यर्थरूक्षाध्यशनाभिघातात् ॥ २ ॥
कषायतिक्तादिविरूढजान्नविरुद्धवल्लूरकशुष्कशाकात् ।
विट्शुक्रमूत्रानिलवेगरोधाच्छोकोपवासादातिहास्यभाषात् ॥ ३ ॥
वायुः प्रवृद्धो जनयेद्धि शूलं हृत्पार्श्वपृष्ठत्रिकबस्तिदेशे ।
जीर्णे प्रदोषे च घनागमे च शीते च कोपं समुपैति गाढम् ॥ ४ ॥
मुहुर्मुहुश्चोपशमप्रकोपौ विण्मूत्रसंस्तम्भनतोदभेदैः ।
संस्वेदनाभ्यञ्जनमर्दनाद्यैः स्निग्धोष्णभोज्यैश्च शमं प्रयाति ॥ ५ ॥
दंडकसरत, बहुत चलना, अतिमैथुन, अत्यन्त जागना, बहुत शीतल जल
पीना, मटर, मूंग, अरहर, कोदों अत्यन्त रूखे पदार्थके सेवनसे और अध्यशन
( भोजनके ऊपर भोजन ), लकडी आदिके लगनेसे, कसैली, कडवी, भीगा अन्न
जिसमें अंकुर निकस आये हों, विरुद्ध क्षीर-मछली आदि, सूखा मांस, सूखा
शाक ( कचरिया आदि) इनके सेवन करनेसे, मल, मूत्र, शुक्र और अधोवायु
इनके वेगको रोकनेसे, शोकसे, उपवास ( व्रत ) के करनेसे, अत्यन्त हँसनेसे, बहुत
बोलनेसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो बढकर हृदय पसवाडा पीठ त्रिकस्थान और
मूत्रस्थानमें शूलको करे और वह भोजन पचनेके पीछे प्रदोषकालमें, वर्षाकालमें,
शीतकालमें इन दिनोंमें शूल अत्यन्त कोप करे और बारंबार कोप होय, मल
मूत्रका अवरोध, पीडा और भेद ये लक्षण वातशूलके हैं तथा स्वेदन और अभ्यं-
जन तथा मर्दन इत्यादिकसे और चिकने गरम अन्नसे यह शूल शांत होता है ॥
पित्तशूलके कारण और लक्षण ।
क्षारातितीक्ष्णोष्णविदाहितैलनिष्पावपिण्याककुलित्थयूषैः ।
कट्वम्लसौवीरसुराविकारैः क्रोधानलायासरविप्रतापैः ॥ ६ ॥
ग्राम्यातियोगादशनैर्विदग्धैः पित्तं प्रकुप्याशु करोति शूलम् ।
तृण्मोहदाहार्तिकरं हि नाभ्यां संस्वेदमूर्च्छाभ्रमशोषयुक्तम् ॥७॥
मध्यंदिने कुप्यति चार्धरात्रे विदाहकाले जलदात्यये च ॥
शीते तु शीतैः समुपैति शान्तिं सुस्वादुशीतैरपि भोजनैश्च ॥८॥

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