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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

by माधवकर

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

DevanagariSanskritpublished404 pages

Page 139 of 404

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Page 139

भाषाटीकासमेत। ( १२१ )
विधिपूर्वक प्रमाणके संग, योग्यकालमें, चिकना आदि अच्छे अन्नके संग बला-
बलके अनुसार अत्यन्त हर्षकें साथ जो मद्यपान करे उसको अमृतके तुल्य गुण
करे। इसके पीनेकी विधि मदात्ययके दूसरे श्लोककी टिप्पणीमें लिख आये हैं तथा
अन्यान्तरोंमें विधि तथा मात्रा कालका नियम लिखा है अर्थात् शुद्ध शरीर होकर
प्रातःकाल सोपदंश ( अर्थात् मद्यपान करनेके बाद जो चटनी आदि पदार्थ खायेजाते
हैं सो ) इन करके सहित दो पल पीवे, मध्याह्नको चार पल पीवे, तदनन्तर चिकना
पदार्थ भोजन करे और सायंकालको आठ पल पीवे, इस जगह पल नाम जयपुरसाई
१ टके पक्केको कहते हैं। अथवा चिकने अन्नके साथ मांसके साथ अथवा और
भक्ष्य हैं उनके साथ मद्यके सेवन करे तो मनुष्यकी आयुष्य बढे, बल बढे तथा
देह पुष्ट हो। इस श्लोकमें "स्निग्धैः सदन्नैः" यह जो पद धरा सो स्निग्धका
एक उपलक्षण है अर्थात् जो मद्यसे विपरीत गुण रखते हैं जैसे तीक्ष्णादि दश गुण
हैं उनसे विपरीत होय उसके साथ मद्य पीना चाहिये सो तीक्ष्णादि दशगुण ग्रन्थां-
तरोंमें लिखे हैं और विशेष देखना होय तो भावप्रकाशमें देख लेवे, इस स्थलमें
ग्रन्थविस्तारभयसे हमने त्याग दिये हैं ॥
विधिसे मद्य पीनेके दूसरे गुण ।
काम्यता मनसस्तुष्टिस्तेजो विक्रम एव च ।
विधिवत्सेव्यमाने तु मद्ये सन्ति हिता गुणाः ॥ ५ ॥
मद्यको विधिपूर्वक पीनेसे सुन्दर (स्वरूप) वस्तुओंमें मनकी वृत्ति, मनको सन्तोष,
उत्साह, दूसरेको जीतनेकी सामर्थ्य इत्यादि हितकारक गुण होते हैं। कही हुई
विधिसे विरुद्ध मद्यपान करनेसे मदात्यय रोग होता है। सो मदात्यय तीन प्रकारका
है-पूर्वमद मध्यमद और अन्त्यमद ॥
१ शुद्धकायः पिबेत्प्रातः सोपदंशंपलद्वयम् । मध्याह्ने द्विगुणं तच्च स्निग्धाहारेण पाचयेत् ॥
प्रदोषेऽष्टपलं तद्वन्मात्रा मद्ये रसायनम् । आरोग्यं धातुसात्म्यं च कांतिपुष्टिबलप्रदम् । अनेन
विधिना सेव्ये मद्य नित्यमतंद्रितैः । अन्यैर्बुद्ध्यादयो यावदुल्लसंति निरत्ययाः ॥ मात्रेयं विहिता
मद्ये पाने रोगाय चापरा ॥ इति । २ तत्र कालो द्विविधः-नित्यकः आवश्यकश्च । तत्र नित्यकः
ऋतुसम्बन्धी । यथा ग्रीष्मे शीतमधुरं माध्वीकादि । शिते उष्णं तीक्ष्णं गौडिकपैष्टिकादि । तथा
आवश्यके काले वाते स्निग्धादि एवं वयस्युदाहार्यम् ॥
३-लघुतीक्ष्णो हि सूक्ष्माम्लो व्यवायाशुगमेव च । रूक्षं विकाशि विशदं मद्ये दशगुणाः
स्मृताः ॥ तथा च सुश्रुते-" मद्यं ह्यम्लं तथा तीक्ष्णं सूक्ष्मं विशदमेव च । रूक्षमाशुकरं चैव
व्यवायि च विकासि च ॥" इति ॥ अत्र अम्लरसत्वं चास्योद्भूतरसत्वेनोक्तम् । यदुक्तमन्यत्र
" सर्वेषामम्लजातीनां मद्यं मूर्ध्नि व्यवस्थितम् ।" इति ॥
१ मद्यपानानन्तरं भक्षणीयद्रव्यविशेषः ॥