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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

Page 175 of 707

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( ५ ) बाण ने कहीं भी भारवि का नाम नहीं लिया है। इससे स्पष्ट है कि भारवि बाण से बहुत पहले नहीं रहे होंगे और न बाण के समय में इतने प्रसिद्ध ही हुए होंगे कि बाण उनका उल्लेख करते। इन सभी विचारों से यही निष्कर्ष निकलता है कि भारवि का समय ५५० ई० से ६०० ई० तक ही माना जा सकता है।

४. किरातार्जुनीयम्

महाकवि भारवि का एकमात्र ग्रन्थ है महाकाव्य 'किरातार्जुनीयम्'। महाकाव्य का नामकरण किरातवेषधारी शङ्कर एवं पाण्डुपुत्र अर्जुन के युद्ध की घटना को लेकर किया गया है जो इस काव्य की प्रमुख घटना है। सम्पूर्ण महाकाव्य १८ सर्गों में निबद्ध है। महाकाव्य के नायक हैं वीर अर्जुन जो पाशुपतादि दिव्यास्त्रों की प्राप्ति के लिये इन्द्रकील पर्वत पर तपस्या करते हैं। नायक के चारित्रिक महत्त्व को बढ़ाने के लिये कवि ने शङ्कर भगवान् को किरात के रूप में उपस्थित किया है। काव्य का मुख्य रस है वीर रस, एवं शृङ्गारादि इसके सहकारी रस हैं। महाकाव्य 'श्री' शब्द से प्रारम्भ होता है और प्रत्येक सर्ग के अन्तिम छन्द में 'लक्ष्मी' शब्द का प्रयोग है। भारवि के युग कवियों की यह एक प्रमुख विशेषता है। 'माघ' एवं श्रीहर्ष ने भी क्रमशः 'श्री' एवं 'आनन्द' शब्द सर्गान्त में प्रयुक्त किये हैं।

कथा की पृष्ठभूमि—महाकाव्य की कथा महाभारत पर आधारित है। महाभारत को कई नाटक एवं महाकाव्यों का उपजीव्य होने का गौरव प्राप्त है। यह काव्य महाभारत की मुख्य कथा से ही सम्बन्धित है। पाण्डु की मृत्यु के बाद पाण्डव धृतराष्ट्र की संरक्षकता में रहने लगे। ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर जब युवक हुए तो धृतराष्ट्र ने उन्हें हस्तिनापुर का युवराज बनाया। धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन युधिष्ठिर के युवराज बन जाने से ईर्ष्या से जल रहा था और उनसे अत्यन्त द्वेष रखता था। दुर्योधन ने पाण्डवों को हर एक प्रकार से कष्ट देने एवं उन्हें नष्ट करने का जाल रचा, किन्तु पाण्डव बचते गये। उन्हें लाक्षागृह में जला देने का भी षड्यन्त्र उसने रचा किन्तु इस बार भी पाण्डव बच निकले। वे ब्राह्मणों का वेष बनाकर गुप्त रूप से रहने लगे और इसी बीच अर्जुन ने द्रौपदी के स्वयंवर में अपनी युद्धकला का प्रदर्शन किया। राजकुमारी द्रौपदी पाँचों पाण्डवों की पत्नी बनी। जब धृतराष्ट्र को पाण्डवों के जीवित होने का समाचार मिला तो उन्होंने उन्हें बुलाकर अपने पुत्रों एवं पाण्डवों में राज्य का विभाजन कर दिया। यमुना के तट पर इन्द्रप्रस्थ नगर को युधिष्ठिर ने अपनी राजधानी बनायी और चारों दिशाओं को जीतकर राजसूय यज्ञ किया। युधिष्ठिर की उन्नति देखकर ईर्ष्यालु दुर्योधन ने एक दूसरा षड्यन्त्र किया और अपने पिता से कहलाकर पाण्डवों को द्यूतक्रीड़ा के लिये निमन्त्रण दिया। दुर्योधन के मामा शकुनि की कपटपूर्ण चाल के आगे पाण्डव दाँव हारते गये और