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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

Page 174 of 707

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किन्तु इस कथन से पूर्णरूपेण सहमत नहीं हुआ जा सकता। यह सम्भव है कि कवि ने पश्चिमी समुद्र तटों पर भ्रमण किया हो और लहरों की क्रीडाओं को जी भर देखा हो; इससे यह नहीं कहा जा सकता कि वे एलिचपुर में रहते हों। महाकवि का हिमालय वर्णन कुछ खटकने वाला एवं कालिदास की तुलना में अधूरा लगता है, अत एव यह कहा जा सकता है कि वे उत्तर भारतीय कवि नहीं थे और न उन्होंने उत्तर भारत की यात्रा ही की थी।

स्थितिकाल—महाकवि भारवि के स्थितिकाल के विषय में निम्न विचार एवं प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं:—

(१) दक्षिण के चालुक्यवंशी नरेश पुलकेशी द्वितीय के समय के ऐहोल शिलालेख में भारवि का नाम कालिदास के साथ मिलता है। यह शिलालेख बीजापुर में ऐहोल ग्राम के एक जैन मन्दिर में मिला है। इसका समय ५५६ शकाब्द अर्थात् ६३४ ई० है। प्रशस्तिलेखक रविकीर्ति कोई जैन कवि है जो अपने को कालिदास और भारवि के समान यशस्वी बताता है ( स विजयतां रविकीर्तिः कविताश्रित-कालिदासभारविकीर्तिः )। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि सातवीं शताब्दी के उत्तरार्ध के पूर्व भारवि इतनी प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे जिससे उनका नाम कालिदास के नाम के साथ लिया जाने लगा था।

(२) चूंकि भारवि का नाम कालिदास के साथ लिया गया है अतः कहा जा सकता है कि ये दोनों समकालीन रहे हों; किन्तु यह उचित नहीं। दोनों की शैली में इतना महान् अन्तर है कि दोनों दो भिन्न-भिन्न युगों के कवि हैं; दोनों के समय की काव्य की धारायें एक दूसरे से इतनी विपरीत हैं कि कालिदास से भारवि तक पहुँचने में काव्य को ६ शताब्दी का समय लग ही गया होगा। अतः भारवि कालिदास के समकालीन नहीं हो सकते।

(३) गंग नरेश दुर्विनीत के समय के गुमरेड्डीपुर के लेख से ज्ञात होता है कि दुर्विनीत ने 'किरातार्जुनीयम्' के १५ वें सर्ग पर टीका लिखी थी। लेख के समय के विषय में विद्वानों में मतभेद है; किन्तु नवीनतम अन्वेषणों से दुर्विनीत का राज्यकाल ५८० ई० ठहरता है और भारवि का समय इसके बाद किसी प्रकार नहीं रखा जा सकता है।

(४) अवन्तिसुन्दरी कथा के आधार पर भारवि विष्णुवर्धन के सभापण्डित थे। विष्णुवर्धन पुलकेशी द्वितीय का अनुज था और लगभग ६१५ में वह महाराष्ट्र पर राज्य करता था। उसका समकालीन होने से भारवि का समय सातवीं शताब्दी के प्रारम्भ होना चाहिये।