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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

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के कई राजा भी हो सकते हैं जैसे रघुवंश में। प्रधान रस शृङ्गार, वीर या शान्तरस होता है और अन्य रस उसके सहायक होते हैं। कथावस्तु नाटक के समान ही होती है, वह ऐतिहासिक हो सकती है या किसी सज्जन के सत्कर्मसम्बन्धी। पुरुषार्थचतुष्टय की प्राप्ति इसका ध्येय होता है और उसकी प्राप्ति के साधनों का वर्णन प्रधान होता है। काव्य के प्रारम्भ में इष्टदेव की स्तुति, मङ्गलकामना या कथा का निर्देश होता है। दुर्जनों की निन्दा तथा सज्जनों की प्रशंसा, सन्ध्या, सूर्योदय, चन्द्रोदय, रात्रि, गोधूलि, दिन, अन्धकार, प्रेमियों का मिलन-वियोग, आखेट, ऋषि, स्वर्ग, नगर, यज्ञ, युद्ध, आक्रमण, विवाह, उपदेश, पुत्रजन्म इत्यादि इसके वर्ण्य विषय होते हैं। महाकाव्य में एक सर्ग में एक ही छन्द का प्रयोग होता है और सर्ग के अन्त में छन्द बदल दिया जाता है। सर्ग न तो बहुत छोटे और न बहुत बड़े होने चाहिये, उनकी संख्या कम से कम आठ होनी चाहिये। कभी-कभी एक ही सर्ग में कई वृत्तों का भी प्रयोग पाया जाता है। सर्ग के अन्त में आगे आने वाले सर्ग की कथा का उल्लेख होता है। महाकाव्य का नाम—कवि, वर्ण्यविषय, नायक या किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर रखा जा सकता है किन्तु प्रत्येक सर्ग का नामकरण उसके अन्तर्गत वर्ण्य विषय के अनुसार ही होना चाहिये।

३. महाकवि भारवि

**व्यक्तिगत जीवन—**संस्कृत साहित्य के महाकवियों में भारवि का दूसरा स्थान है। कवि के व्यक्तिगत जीवन के विषय में हमारा ज्ञान अनिश्चित सा ही है। कदाचित हमारे महाकवि को अत्यन्त दुःखमय एवं निर्धनतापूर्ण जीवन व्यतीत करना पड़ा था जैसे जीवन का वरदान सदैव से सभी भाषा के महाकवियों को मिलता रहा है। अपने यौवन में उनकी प्रतिभा का आदर करने वाला, एवं उन्हें आश्रय देने वाला भी शायद कोई न मिला था। भारवि की निर्धनता के सम्बन्ध में एक रोचक कथा भी प्रचलित है। महाकवि के घर में निर्धनता का ताण्डवनृत्य हो रहा था और महाकवि थे जो काव्य सरोवर में गोते लगाने में आनन्द ले रहे थे। कविप्रिया से कवि की यह लापरवाही कैसे सही जा सकती थी ? अपने व्यंग्य बाणों से वह कवि के हृदय को बेधती, खरी-खोटी सुनाती ही रहती। पत्नी की डाँट-फटकार से ऊबकर कवि ने अपनी अकर्मण्यता का अनुभव किया। आसन डोला, और वे चल पड़े राजा का आश्रय ढूँढ़ने के लिये। कुछ ही दूर गये होंगे कि एक सुन्दर सरोवर मिला; प्रकृति के प्रेमी कवि के लिये सरोवर का आकर्षण प्रबल हो गया और थका-माँदा कवि वहीं विश्राम करने लगा। वहीं कवि ने इस श्लोक की रचना की :—

सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणुते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ (कि० २ : ३०)

• कवि को अपनी दशा का अनुभव तो हो ही चुका था अतः श्लोकानुसार ही वह जिसे