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किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)

Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi

by महाकवि भारवि

Source: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (origin)

DevanagariHindipublished707 pages

Page 171 of 707

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भूमिका

१. संस्कृत काव्य

संस्कृत में सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं को दो भागों में बाँटा गया है। दृश्य-काव्य और श्रव्यकाव्य । दृश्यकान्य के अन्तर्गत नाटकादि आ जाते हैं। श्रव्यकाव्य के भी तीन भेद हो जाते हैं :- १. पद्य २. गद्य ३. चम्पू ( 'पद्यं गद्यं च मिश्रं च तत् त्रिधैव व्यवस्थितम्'—दण्डिनः) । पुनः पद्य के भी दो प्रकार होते हैं :- १. महाकाव्य—जैसे रघुवंशम्, किरातार्जुनीयम्, शिशुपालवधम् इत्यादि, २. खण्डकाव्य—जैसे, मेघदूत, भामिनीविलास, अमरुकशतक इत्यादि । गद्य के भी दो प्रकार होते हैं :—( १ ) कथा—जैसे कादम्बरी और ( २ ) आख्यायिका—जैसे, हर्षचरित । श्रव्यकाव्य का तीसरा भेद है चम्पू, जो गद्य और पद्य दोनों का मिश्रण होता है; जैसे भारतचम्पू, विश्वगुणादर्श चम्पू इत्यादि ( 'गद्यपद्यमयं काव्यं चम्पूरित्यभिधीयते' ) ?

२. महाकाव्य के लक्षण

'किरातार्जुनीयम्' एक महाकाव्य है जैसा नाम ही से स्पष्ट है । 'महाकाव्य' एक बड़ा काव्य होता है जो विस्तार में तो बड़ा होता ही है, हर दृष्टि से बड़ा होता है । संस्कृत के आलंकारिकों ने महाकाव्य के लक्षणों की विस्तृत विवेचना की है। अग्निपुराण, काव्यादर्श साहित्यदर्पण, काव्यालङ्कार एवं सरस्वतीकण्ठाभरण ग्रन्थों में महाकाव्य की परिभाषा दी गई है । यहाँ हम 'साहित्यदर्पण' से महाकाव्य की विस्तृत परिभाषा उद्धृत करते हैं :—

सर्गबन्धो महाकाव्यं तत्रैको नायकः सुरः । सद्वंशः क्षत्रियो वाऽपि धीरोदात्तगुणान्वितः ॥
एकवंशभवा भूपाः कुलजा बहवोऽपि वा । शृङ्गारवीरशान्तानामेकोऽङ्गी रस इष्यते ॥
अङ्गानि सर्वेऽपि रसाः सर्वे नाटकसंधयः । इतिहासोद्भवं वृत्तमन्यद्वा सज्जनाश्रयम् ॥
चत्वारस्तस्य वर्गाःस्युस्तेष्वेकं च फलं भवेत् । आदौ नमस्क्रियाऽऽशीर्वा वस्तुनिर्देश एव वा ॥
क्वचिन्निन्दा खलादीनां सतां च गुणकीर्तनम् । एकवृत्तमयैः पद्यैरवसानेऽन्यवृत्तकैः ॥
नातिस्वल्पा नातिदीर्घा सर्गा अष्टाधिका इह । नानावृत्तमयः क्वापि सर्गः कश्चन दृश्यते ॥
सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथायाः सूचनं भवेत् । संध्यासूर्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासराः ॥
प्रातर्मध्याह्नमृगयाशैलर्तुवनसागराः । संभोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वराः ॥
रणप्रयाणोपयममन्त्रपुत्रोदयादयः । वर्णनीया यथायोगंसाङ्गोपाङ्गा अमी इह ॥
कवेर्वृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा । नामास्य सर्गोपादेयकथया सर्गनाम तु ॥

सर्वप्रथम महाकाव्य सर्गों में विभक्त होता है। नायक—या तो कोई देवता या उच्चवंशोत्पन्न क्षत्रिय होता है, वह धीरोदात्त प्रकृति का नायक होता है। नायक एक वंश