खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [प्रथम
क्रियोत्पद्यत एव, उत यस्मादनन्तरं क्रिया तिष्ठत्येव, उत यस्मिन् वर्तमाने
क्रिया तिष्ठत्येव ?
नाद्यः; सामग्र्याः करणत्वप्रसङ्गात्, हस्तादीनामकरणत्वप्रसङ्गाच्च,
सुखदुःखदेः प्रमेयस्यापि प्रमाकरणत्वप्रसङ्गाच्च । न च प्रमेयमपि प्रमायाः करणं
स्यादेवेति वाच्यम्; तत्र तथाव्यवहारस्य कस्यचिदप्यसिद्धेः ।
नापि द्वितीयः; स्पृश्येन सह स्थिरसंयोगस्य स्पर्शनैन्द्रियस्याव्यापनात् ,
तत्सत्त्वेऽपि व्यासक्तौ तेन प्रमानुत्पादनात् । नापि तृतीयः ; सामग्र्यादेः करणत्व-
प्रसङ्गात्, उत्पत्तेः, स्थिरे करणत्वप्रसङ्गाच्च । नापि चतुर्थः; सहस्थायिनां
करणत्वप्रसङ्गात् ।
अर्थ है, 'जिसके अनन्तर क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है अथवा 'जिसके
रहते क्रिया अवश्य रहती हो' यह अर्थ है ?
इन चार कल्पों में प्रथम कल्प युक्त नहीं है । कारण, सामग्री के अनन्तर भी अवश्य
कार्य उत्पन्न होता है, अतः सामग्री करण हो जायगी । किञ्च - हस्त-व्यापार के अनन्तर
कदाचित् पाकादि क्रिया नहीं भी होती, अतः हस्तादि में लक्षण की अव्याप्ति हो
जायगी । सुख-दुःख अवश्य वेद्य हैं । अर्थात् सुखादि क्षणभर भी अज्ञात नहीं रहते,
किन्तु उत्पत्तिके अनन्तर इनकी प्रमिति अवश्य होती है, अतः सुखादि भी स्व-
प्रमिति के करण हो जायेंगे । प्रमेय भी प्रमा का करण होता है, यह तो कभी नहीं कह
सकते ; कारण कर्म में करण-व्यवहार देखा नहीं जाता ।
द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है ; कारण व्यासङ्ग-दशा में त्वगादि इन्द्रिय और
स्पृश्यादि विषयोंका संनिकर्ष होने पर भी प्रमिति न होने से त्वगादि इन्द्रियों में
अव्याप्ति हो जायगी ।
तृतीय कल्प भी प्रायः प्रथम कल्प में उक्त दूषण से ही दूषित है । किञ्च - जो
कार्यों को स्थिर मानते हैं अर्थात् क्षणिक नहीं मानते, उनके मत में भी घटादि से
स्वसत्तारूप क्रिया अनन्तर होती है. अतः घटादि स्वसत्त्वरूप क्रिया में करण हो जायेंगे ।
चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है, कारण एक साथ रहनेवाले रूपादि के रहने पर ही
रसादि रहते हैं । अतः सहस्थायी रूपादि भी रसादि के करण हो जायेंगे ।